महाराष्ट्र में मुस्लिम आरक्षण खत्म: सरकार ने रद्द किया 5% कोटे का आदेश
मुंबई/पुणे | महाराष्ट्र की राजनीति और सामाजिक ढांचे में एक बड़ा बदलाव लाते हुए, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार ने मुस्लिम समुदाय को मिलने वाले 5 प्रतिशत आरक्षण को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। सरकार ने बुधवार को एक नया सरकारी आदेश (GR) जारी कर, करीब एक दशक पुराने उस निर्णय को रद्द कर दिया है जिसके तहत शिक्षा और नौकरियों में यह कोटा दिया गया था।
क्यों लिया गया यह फैसला?
सरकारी सूत्रों के अनुसार, यह निर्णय मुख्य रूप से कानूनी और तकनीकी खामियों के कारण लिया गया है। इस फैसले के पीछे निम्नलिखित प्रमुख कारण बताए गए हैं:
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अध्यादेश की समय सीमा: यह आरक्षण जुलाई 2014 में एक अध्यादेश (Ordinance) के जरिए लागू किया गया था। नियमानुसार, किसी भी अध्यादेश को 6 महीने के भीतर कानून में बदलना अनिवार्य होता है, जो तत्कालीन परिस्थितियों में नहीं हो सका। इसके चलते यह अध्यादेश तकनीकी रूप से पहले ही निष्प्रभावी हो गया था।
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बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख: बॉम्बे हाई कोर्ट ने पहले ही सरकारी नौकरियों में इस 5% मुस्लिम कोटे पर अंतरिम रोक लगा दी थी, हालांकि उस समय शिक्षा के क्षेत्र में इसे जारी रखने की अनुमति दी गई थी। अब नए आदेश के बाद दोनों ही क्षेत्रों से यह आरक्षण समाप्त हो गया है।
नए आदेश का तत्काल प्रभाव
सरकार द्वारा जारी नए जीआर (GR) के बाद राज्य में निम्नलिखित बदलाव तत्काल प्रभाव से लागू हो गए हैं:
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जाति प्रमाण पत्र पर रोक: मुस्लिम समुदाय के सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग (SEBC) के तहत नए जाति प्रमाण पत्र और उनकी वैधता (Validity) की प्रक्रिया रोक दी गई है।
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भर्ती और प्रवेश: सरकारी और अर्धसरकारी नौकरियों में सीधी भर्ती और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के दौरान मिलने वाला 5% का लाभ अब देय नहीं होगा।
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SBC-A श्रेणी खत्म: सरकार ने पूर्व में बनाई गई ‘स्पेशल बैकवर्ड कैटेगरी-ए’ (SBC-A) के ढांचे को भी भंग कर दिया है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 2014 से अब तक
मुस्लिम आरक्षण की नींव जुलाई 2014 में तत्कालीन कांग्रेस-NCP (पृथ्वीराज चव्हाण) सरकार ने रखी थी। उस समय मराठा समुदाय के लिए 16% और मुस्लिम समुदाय के लिए 5% आरक्षण का प्रावधान किया गया था, जिससे राज्य में कुल आरक्षण का दायरा 73% तक पहुँच गया था। 23 दिसंबर 2014 को इस संबंध में अंतिम निर्णय लिया गया था, जिसे अब फडणवीस सरकार ने पूरी तरह रद्द कर दिया है।
विपक्ष और सामाजिक प्रतिक्रिया
इस फैसले के बाद महाराष्ट्र की सियासत गरमाने के आसार हैं। जहाँ सत्ता पक्ष इसे कानूनी प्रक्रिया का पालन बता रहा है, वहीं विपक्षी दल इसे अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर प्रहार करार दे सकते हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह फैसला किसी समुदाय के विरोध में नहीं, बल्कि संवैधानिक और कानूनी व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने के लिए लिया गया है।
