GST सहायक आयुक्त ने पुलिसिया गुंडों से निरीक्षक को बंधक बनवाकर पिटवाया

लखनऊ। मोदी सरकार GST (केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर) के एक साल पूरे होने का जश्न मना रही है। वहीं GST विभाग के अधिकारी अपने ही कर्मचारियों को अपने जूते की नोक पर रखे हुए हैं। ऐसा ही एक मामला बाराबंकी मंडल में तैनात सहायक आयुक्त अर्निका यादव ने अपने व्यक्तिगत संबंधों के बल पर अपने ही विभाग में गुंडाराज कायम किया हुआ है। विभागीय कर्मचारियों, यूनियन और एसोसिशन को डराने के लिए अपने पारिवारिक और व्यक्तिगत संबंधों का गुणगान करना नहीं भूलती हैं। उनकी बातों से ऐसा प्रतीत होता है कि सूबे के IAS और IPS उनके इशारे में नाचते हैं।

इसका ताजा उदाहरण उन्होंने 11 जुलाई को विभाग को देखने को मिला। सहायक आयुक्त अर्निका यादव और निरीक्षक लाल बाबू पांडेय से लॉग बुक भरने को लेकर कहा सुनी हो गई। सहायक आयुक्त अर्निका यादव ने संबंधों के बल पर पुलिसया गुंडों को बुला लिया। बिना किसी लिखित शिकायत के पुलिसया गुंडे निरीक्षक लाल बाबू पांडेय को गरियाते हुए थाने ले गये। पुलिसिया गुंडों ने इन्हें लगभग 12 घंटे तक थाने में बंधक बनाये रखा। जहां निरीक्षक लाल बाबू पांडेय को पुलिसिया गुंडों ने बांधकर मारापीटा और मुंह बंद रखने को कहा। झूठे केस में फसाने की धमकी भी दी। GST विभाग के उच्च अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद दूसरे दिन निरीक्षक लाल बाबू पांडेय को छुड़ाया जा सका। निरीक्षक वर्ग में इस घटना के बाद ख़ासा रोष है।

इस तरह अवैध रूप से एक केंद्रीय अधिकारी को बिना किसी भी लिखित शिकायत के कार्यालय समय में उठाना और बंधक बना के रख के प्रताडि़त करने से क़ानून व्यवस्था का खोखलापन और अधिकारियों का मनमानापन एक बार फिर से उजागर हो गया।

इस घटनाक्रम से मोदी सरकार के जीएसटी में लोक सेवा के दावों की पोल खुलती नज़र आती हैं क्यूँकि जब अपने ही विभाग के अधिकारियों को इस तरह अपने अहम के लिए प्रताडि़त किया जा सकता हैं तो फिर आम जनता की क्या बिसात?

ज्ञात हो किसी भी कार्यालय में सीसीएस कांडक्ट रूल में अधिकारियों को असीमित शक्तियांँ अपने अधिनस्थों को दंडित करने के लिए प्राप्त हैं। लेकिन उनका उपयोग न कर अपने क्षेत्र में पहचान से और अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर एक केंद्रीय अधिकारी को अगवा कर प्रताडि़त करना क्या क्रिमिनल ऐक्ट नहीं हैं ?

सूत्रों से पता चता है कि कार्यालय के पैसों को ग़लत तरीक़े से अपने सुविधाओं के लिए ख़र्च करने और GST आने पर भी अपने निजी कार्यों कार्यालय आने जाने के लिए सरकारी वाहन का सहायक आयुक्तों द्वारा लगातार दुरुपयोग किया जा रहा हैं। इसी तरह डरा धमका के निरीक्षकों से फर्जी लॉग बुक कार के लिए भरवायी जाती हैं जिसका पूर्णतया निजी उपयोग होता हैं।

ज्ञात हो कि सहायक आयुक्त को केंद्रीय सरकार ने गाड़ी का प्रावधान नहीं किया हैं। सरकार को केवल एक सहायक आयुक्त के निजी उपयोग के लिए कार पर प्रतिमाह लगभग 30 हज़ार रूपया ख़र्च करना पड़ता हैं जबकि सहायक आयुक्त को कहीं भी आने-जाने के लिए लगभग 10 हजार रूपये भत्ता भी मिलता हैं। निरीक्षक वर्ग ने पुलिसियां गुंडों पर कार्रवाई की मांग की है।