रॉयल सहकारी आवास समिति में सचिव पद को लेकर विवाद गहराया
ग्रेटर नोएडा। रॉयल सहकारी आवास समिति लिमिटेड में सचिव पद को लेकर विवाद अब इस्तीफे, कार्यभार संभालने, विभागीय जांच और उत्तर प्रदेश सहकारी समिति अधिनियम, 1965 की धारा 38 के तहत हुई कार्रवाई से होते हुए हाईकोर्ट तक पहुंच गया है। उपलब्ध दस्तावेजों से सामने आने वाले घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सचिव पद की जिम्मेदारी किसके पास थी और जांच के दौरान अभिलेख उपलब्ध कराने तथा सहयोग करने की जिम्मेदारी किसकी बनती थी।
उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार अंकित आलोक श्रीवास्तव ने 4 अगस्त 2025 को सचिव पद से इस्तीफा दिया और उसके बाद कमलेश कुमार श्रीवास्तव ने सचिव के रूप में कार्यभार संभाला। कमलेश बाद में तीन महीने से अधिक समय तक इस पद पर रहे। इसी अवधि के दौरान विभागीय जांच आगे बढ़ी और जांच अधिकारी ने उन्हें अपना पक्ष रखने तथा संबंधित अभिलेख उपलब्ध कराने के लिए कई अवसर दिए।
जांच अधिकारी के अनुसार अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने के कारण अंततः उन्होंने अपनी अंतिम रिपोर्ट में धारा 38 के तहत कार्रवाई की संस्तुति की। कमलेश ने हालांकि अपने बचाव में यह तर्क दिया कि अंकित सितंबर 2025 तक कार्यालय में कार्य करते रहे थे और इसलिए जांच से संबंधित जिम्मेदारी केवल उनके ऊपर नहीं डाली जा सकती।
4 अगस्त को अंकित ने दिया इस्तीफा
दस्तावेजों के अनुसार अंकित आलोक श्रीवास्तव ने 4 अगस्त 2025 को समिति के अध्यक्ष को पत्र लिखकर व्यक्तिगत और पेशेवर कारणों का हवाला देते हुए मानद सचिव पद से इस्तीफा दिया था। उन्होंने इस्तीफा तत्काल प्रभाव से स्वीकार करने का अनुरोध किया था।
इसके बाद 8 अगस्त 2025 को उन्होंने समिति के सदस्यों को ई-मेल भेजकर अपने इस्तीफे की जानकारी भी दी।
इसके बाद सचिव पद की जिम्मेदारी कमलेश कुमार श्रीवास्तव ने संभाली।

अंकित का पत्र अधिकारियों तक पहुंचा, फिर भी संज्ञान क्यों नहीं?
उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार अंकित आलोक श्रीवास्तव ने 24 मई 2026 को आवास आयुक्त और अपर आवास आयुक्त/अपर निबंधक, उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद को ई-मेल के माध्यम से अपना विस्तृत स्पष्टीकरण भेजा था। पत्र में उन्होंने अपने इस्तीफे, उसकी स्वीकृति और 4 अगस्त 2025 के बाद समिति के किसी भी कार्य से अलग रहने की बात स्पष्ट रूप से रखी थी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पत्र केवल किसी एक अधिकारी को नहीं, बल्कि आवास आयुक्त, अपर आवास आयुक्त/अपर निबंधक और परिषद के संबंधित अधिकारियों को भेजा गया था। ई-मेल रिकॉर्ड में इन अधिकारियों के आधिकारिक पते भी दर्ज हैं।
9 अगस्त के पत्र ने पैदा किया नया सवाल
मामले में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज 9 अगस्त 2025 का है। इसमें कथित तौर पर अंकित से नई व्यवस्था होने तक सचिव पद पर बने रहने का अनुरोध किया गया था।
अंकित का कहना है कि इस पत्र की विधिवत जानकारी उन्हें नहीं दी गई। उनके अनुसार न तो पत्र उन्हें व्यक्तिगत रूप से दिया गया, न ई-मेल से भेजा गया और न ही उनके संज्ञान में विधिवत लाया गया। उन्होंने पत्र की सेवा का प्रमाण तथा उस बैठक की प्रमाणित कार्यवाही मांगी जिसके आधार पर उन्हें इस्तीफे के बाद भी पद पर बने रहने के लिए कहा गया था।
महत्वपूर्ण रूप से, उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार यह पत्र उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद (UPAVP) को भी संप्रेषित किया गया था।
यहीं से विवाद का एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—यदि अंकित से पद पर बने रहने का अनुरोध किया गया था और इसकी सूचना UPAVP को भी दी गई थी, तो क्या इसकी विधिवत सूचना स्वयं अंकित को दी गई थी?
तीन महीने से अधिक समय तक कमलेश के पास रही जिम्मेदारी
इस बीच एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अंकित के इस्तीफे के बाद कमलेश कुमार श्रीवास्तव ने सचिव के रूप में कार्यभार संभाला और जांच अधिकारी की कार्रवाई शुरू होने तथा अंतिम संस्तुति दिए जाने तक तीन महीने से अधिक समय तक पद पर रहे।
इसी दौरान जांच अधिकारी ने समिति से संबंधित शिकायतों की जांच के लिए कमलेश को कई बार पत्र भेजे। 22 जुलाई, 26 अगस्त, 2 सितंबर और अन्य तारीखों के पत्राचार का उल्लेख जांच संबंधी दस्तावेजों में मिलता है।
31 अक्टूबर 2025 को जांच अधिकारी ने अंतिम अवसर देते हुए 3 नवंबर को उपस्थित होकर अपना लिखित पक्ष और संबंधित अभिलेख प्रस्तुत करने को कहा।
रिपोर्ट के अनुसार कमलेश जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित हुए और अपना पक्ष एवं अभिलेख प्रस्तुत करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा। उन्हें अतिरिक्त समय दिया गया। इसके बावजूद जांच अधिकारी ने रिकॉर्ड में अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने की बात दर्ज की। इसके बाद 18 नवंबर 2025 को भी जांच में सहयोग के लिए पत्र भेजे जाने का उल्लेख है।
अर्थात, कमलेश के पास सचिव के रूप में काम करने और संबंधित रिकॉर्ड प्रस्तुत करने के लिए पर्याप्त समय और अवसर उपलब्ध होने के बावजूद, जांच अधिकारी के अनुसार अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। इसके बाद जांच अधिकारी ने अपनी अंतिम संस्तुति में धारा 38 के तहत कार्रवाई की सिफारिश की।
कमलेश का बचाव—जिम्मेदारी अंकित की थी
कमलेश ने अपने बचाव में यह तर्क रखा कि अंकित इस्तीफा देने के बाद भी सितंबर 2025 तक कार्यालय में मौजूद रहे और काम करते रहे थे। इसलिए जांच से संबंधित अभिलेखों और मामलों की जिम्मेदारी अंकित की थी और उनके कथित गैर-सहयोग को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
लेकिन अंकित का पक्ष अलग है। उनका कहना है कि उन्होंने 4 अगस्त को सचिव पद से इस्तीफा दे दिया था और उसके बाद उन्हें सचिव के रूप में कार्य जारी रखने के संबंध में कोई विधिवत सूचना नहीं मिली।
यही स्थिति 9 अगस्त के पत्र को महत्वपूर्ण बनाती है। यदि समिति के रिकॉर्ड में अंकित को पद पर बने रहने का अनुरोध मौजूद था और वही पत्र UPAVP को भी भेजा गया था, तो उसके विधिवत संप्रेषण और उसकी स्वीकृति या अनुपालन का रिकॉर्ड मामले में महत्वपूर्ण हो जाता है।
साथ ही, यह तथ्य भी रिकॉर्ड पर है कि कमलेश ने सचिव का कार्यभार संभालने के बाद तीन महीने से अधिक समय तक पद पर रहते हुए जांच अधिकारी के समक्ष अपना पक्ष और रिकॉर्ड प्रस्तुत करने के कई अवसर प्राप्त किए। अंततः जांच अधिकारी ने उनके कथित गैर-सहयोग को दर्ज करते हुए अपनी अंतिम संस्तुति प्रस्तुत की।
धारा 38 की कार्रवाई और हाईकोर्ट
जांच अधिकारी की संस्तुति के बाद कमलेश के खिलाफ उत्तर प्रदेश सहकारी समिति अधिनियम, 1965 की धारा 38 के तहत कार्रवाई की गई और उन्हें सचिव पद से हटाने का आदेश जारी हुआ।
इस आदेश को कमलेश ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार चुनौती *3 जुलाई 2026* के हटाने के आदेश के खिलाफ थी।
18 अगस्त 2026 को हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए उक्त आदेश के संचालन पर रोक लगा दी और अंतरिम रूप से याचिकाकर्ता को पहले की तरह कार्य करने की अनुमति दी।
सुनवाई के दौरान धारा 38(1) के तहत अपनाई गई प्रक्रिया पर भी आपत्ति उठाई गई। याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि संबंधित प्रावधान के तहत नोटिस सोसायटी को दिया जाना चाहिए था, जबकि कार्रवाई में प्रबंध समिति को नोटिस दिए जाने का प्रश्न उठा।
हाईकोर्ट ने इस दलील को प्रथमदृष्टया विचारणीय माना और धारा 38(2) के तहत हुई कार्रवाई पर भी प्रथमदृष्टया कानूनी आपत्ति पाई। इसके बाद अदालत ने नोटिस जारी करते हुए हटाने के आदेश के संचालन पर रोक लगा दी।
विवाद का असली केंद्र
दस्तावेजों को घटनाक्रम के क्रम में देखने पर विवाद के तीन अलग-अलग पहलू सामने आते हैं।
पहला, अंकित ने 4 अगस्त को सचिव पद से इस्तीफा दिया और कमलेश ने उसके बाद सचिव की जिम्मेदारी संभाली।
दूसरा, रिकॉर्ड में 9 अगस्त का ऐसा पत्र मौजूद है जिसमें अंकित से नई व्यवस्था होने तक पद पर बने रहने का अनुरोध किया गया था और यह पत्र UPAVP को भी भेजा गया था। अंकित का कहना है कि इस पत्र की जानकारी उन्हें विधिवत नहीं दी गई।
तीसरा, कमलेश ने तीन महीने से अधिक समय तक सचिव के रूप में कार्य करने के बाद भी, जांच अधिकारी के अनुसार, अपेक्षित सहयोग नहीं किया, जिसके बाद जांच अधिकारी ने अपनी अंतिम संस्तुति में धारा 38 के तहत कार्रवाई की सिफारिश की। कमलेश ने इसके विपरीत अंकित के सितंबर तक कार्यालय में कार्यरत रहने को अपनी जिम्मेदारी के बचाव में आधार बनाया।
इसलिए पूरे विवाद का मूल प्रश्न केवल यह नहीं है कि कौन कार्यालय में मौजूद था। असली सवाल यह है कि किस तारीख से किस व्यक्ति के पास सचिव पद की औपचारिक जिम्मेदारी थी, किसे समिति के अभिलेखों का वैधानिक दायित्व सौंपा गया था और जांच के दौरान रिकॉर्ड प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी किसकी थी।
इन सवालों का अंतिम उत्तर समिति के प्रमाणित रिकॉर्ड, कार्यभार हस्तांतरण के दस्तावेज, 9 अगस्त के पत्र की विधिवत सेवा के प्रमाण और धारा 38 के तहत अपनाई गई पूरी प्रक्रिया से ही सामने आएगा।
फिलहाल हाईकोर्ट की अंतरिम रोक ने हटाने की कार्रवाई पर रोक लगा दी है। मामले का अंतिम फैसला अदालत द्वारा संबंधित रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार के बाद होगा।
