शीतला सप्तमी आज: श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा ‘बसोड़ा’

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नई दिल्ली | धर्म डेस्क। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाने वाला शीतला सप्तमी का पर्व आज, 10 मार्च 2026 को पूरे देश में पारंपरिक श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जा रहा है। इस पर्व को उत्तर भारत के कई हिस्सों में ‘बसोड़ा’ या ‘बसियोरा’ के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शीतला माता की आराधना करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और संक्रामक रोगों, विशेषकर चेचक और खसरा जैसी बीमारियों से बच्चों की रक्षा होती है।

आज पूजा का शुभ मुहूर्त

ज्योतिषीय गणना के अनुसार, चैत्र कृष्ण सप्तमी तिथि का उदय 10 मार्च को हो रहा है। आज पूजन के लिए निम्नलिखित समय श्रेष्ठ माने गए हैं:

  • प्रातः काल पूजन: सुबह 06:04 बजे से शाम 05:56 बजे तक।

  • अमृत चौघड़िया: दोपहर 12:31 से दोपहर 02:00 बजे तक (विशेष फलदायी)।

क्यों लगाया जाता है ‘बासी’ भोजन का भोग?

शीतला सप्तमी का अर्थ ही ‘शीतलता’ प्रदान करने वाली देवी से है। इस दिन की सबसे अनूठी परंपरा माता को बासी भोजन (ठंडा भोजन) अर्पित करना है। श्रद्धालु एक दिन पूर्व यानी षष्ठी की रात को ही हलवा-पूरी, मीठे चावल, गुलगुले और दही-राबड़ी जैसे पकवान तैयार कर लेते हैं। आज के दिन माता को इन्हीं पकवानों का नैवेद्य लगाया जाता है और परिवार के सदस्य भी प्रसाद के रूप में ठंडा भोजन ही ग्रहण करते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से भी ऋतु परिवर्तन (सर्दियों की विदाई और गर्मियों का आगमन) के इस समय में ठंडा भोजन शरीर को आने वाली गर्मी के लिए तैयार करने का प्रतीक माना जाता है।

इन नियमों का पालन है अनिवार्य

शास्त्रों के अनुसार, शीतला सप्तमी के दिन कुछ कड़े नियमों का पालन किया जाता है:

  1. चूल्हा जलाना वर्जित: आज के दिन घर में चूल्हा या गैस जलाना पूर्णतः वर्जित माना गया है। घर में ताज़ा भोजन नहीं पकाया जाता।

  2. गर्म जल का त्याग: आज स्नान के लिए भी शीतल जल का उपयोग किया जाता है और गर्म भोजन या पेय पदार्थों का सेवन नहीं किया जाता।

  3. स्वच्छता और दान: माता शीतला को स्वच्छता अत्यंत प्रिय है, इसलिए आज के दिन घर की सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है। पूजा के बाद निर्धनों को ठंडा भोजन और जल दान करना शुभ माना जाता है।

  4. सिलाई-कढ़ाई की मनाही: आज के दिन सुई-धागे का काम, सिलाई या बुनाई करना भी वर्जित होता है।

धार्मिक मान्यता

पौराणिक कथाओं के अनुसार, शीतला माता स्वच्छता और आरोग्य की देवी हैं। वे अपने हाथों में झाड़ू, कलश, नीम के पत्ते और सूप धारण करती हैं, जो स्वच्छता और रोगों के निवारण का प्रतीक हैं। माताओं द्वारा रखा जाने वाला यह व्रत बच्चों की दीर्घायु और निरोगी काया सुनिश्चित करता है।

सावधानी: स्वास्थ्य संबंधी किसी भी गंभीर समस्या होने पर चिकित्सकीय सलाह अवश्य लें। यह लेख केवल धार्मिक मान्यताओं और पंचांग की गणना पर आधारित है।

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