पिता ने बताया क्यों मायानगरी की चमक छोड़ ‘मिट्टी’ की ओर लौटे अरिजीत सिंह

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arjit singh

मुंबई/जियागंज। अपनी मखमली आवाज से दुनिया को दीवाना बनाने वाले अरिजीत सिंह आज सफलता के उस मुकाम पर हैं जहाँ पहुँचने का सपना हर कलाकार देखता है। लेकिन करोड़ों की संपत्ति और ग्लोबल फेम के बावजूद, अरिजीत ने मुंबई की चकाचौंध को अलविदा कह कर अपने छोटे से पैतृक गांव जियागंज (पश्चिम बंगाल) को अपना ठिकाना बना लिया है। अब पहली बार उनके पिता सुरिंदर सिंह ने इस बड़े फैसले के पीछे के भावनात्मक और व्यावहारिक कारणों का खुलासा किया है।

“मुंबई में सहज नहीं थे अरिजीत”

अरिजीत के पिता के अनुसार, अरिजीत का स्वभाव हमेशा से सादगी पसंद रहा है। पिता ने बताया:

  • दिखावे से दूरी: मुंबई में अपार सफलता के बाद भी अरिजीत वहां की ग्लैमरस और बनावटी जीवनशैली में कभी फिट नहीं हो पाए।

  • शांति की तलाश: जियागंज की शांत गलियां और वहां के लोग उन्हें हमेशा अपनी ओर खींचते थे। वे वहां एक ‘सुपरस्टार’ नहीं, बल्कि अपने पुराने ‘शोमु’ बनकर रहना पसंद करते हैं।

गुरुद्वारे से शुरू हुई थी सुरों की यात्रा

पिता ने पुरानी यादें साझा करते हुए बताया कि अरिजीत के संगीत की जड़ें जियागंज के स्थानीय गुरुद्वारे में हैं। बचपन में वे अपनी मां के साथ वहां कीर्तन गाने जाते थे। यही वह जगह थी जहाँ से उनके सुरों को गहराई मिली। आज भी जब वे जियागंज में होते हैं, तो एक साधारण इंसान की तरह अपनी स्कूटी पर सब्जी लेने निकल जाते हैं या पड़ोसियों के साथ गप्पे लड़ाते दिखते हैं।

अगली पारी: समाज सेवा और गांव का विकास

सिंगिंग से धीरे-धीरे रिटायरमेंट की ओर बढ़ने के संकेतों के बीच, अरिजीत अब अपना समय समाज सेवा में लगा रहे हैं:

  • शिक्षा पर जोर: उन्होंने अपने बच्चों को मुंबई के इंटरनेशनल स्कूलों के बजाय जियागंज के साधारण स्कूल में भर्ती कराया है, ताकि वे अपनी जड़ों को समझ सकें।

  • सोशल प्रोजेक्ट्स: वे अपने गांव में स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति सुधारने के लिए कई चैरिटी प्रोजेक्ट्स पर खुद व्यक्तिगत रूप से काम कर रहे हैं।

रिटायरमेंट की खबरों के बीच काम जारी

भले ही अरिजीत अब फिल्मों में पहले जितना सक्रिय न हों, लेकिन उनके चाहने वालों के लिए अच्छी खबर यह है कि उन्होंने हाल ही में आमिर खान प्रोडक्शंस की फिल्म ‘एक दिन’ के लिए एक खूबसूरत गाना रिकॉर्ड किया है। साथ ही, फरवरी 2026 में कोलकाता में अनुष्का शंकर के साथ उनकी जुगलबंदी ने यह साबित कर दिया कि संगीत हमेशा उनके जीवन का हिस्सा रहेगा, चाहे वे कहीं भी रहें।

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