राज्यसभा में राघव चड्ढा ने उठाई ‘राइट टू रिकॉल’ की मांग
नई दिल्ली। संसद के बजट सत्र के दौरान आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने ‘राइट टू रिकॉल’ (Right to Recall) यानी ‘जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार’ का मुद्दा उठाकर एक नई संवैधानिक बहस छेड़ दी है। चड्ढा ने तर्क दिया कि लोकतंत्र में यदि जनता के पास नेता चुनने की शक्ति है, तो काम न करने वाले जनप्रतिनिधियों को पद से हटाने का अधिकार भी मतदाताओं के पास होना चाहिए।
जवाबदेही तय करने का बड़ा हथियार
शून्यकाल के दौरान अपनी बात रखते हुए राघव चड्ढा ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में एक बार निर्वाचित होने के बाद जनप्रतिनिधि पांच साल के लिए निश्चिंत हो जाते हैं। उन्होंने कहा, “अगर मतदाता अपने नेताओं को चुन सकते हैं, तो उन्हें काम न करने पर हटाने का हक भी मिलना चाहिए। यह व्यवस्था मतदाताओं को सही मायने में अधिकार संपन्न बनाएगी और नेताओं की जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करेगी।”
राष्ट्रपति और जजों का दिया उदाहरण
आप सांसद ने संसद में दलील दी कि जब भारत के संविधान में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने के लिए महाभियोग (Impeachment) जैसी जटिल प्रक्रिया मौजूद है, तो विधायकों और सांसदों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था क्यों नहीं है? उन्होंने कहा कि सरकारों के खिलाफ भी अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है, तो जनप्रतिनिधियों के मामले में भी जवाबदेही का यही मानक लागू होना चाहिए।
दुरुपयोग रोकने के लिए सुरक्षात्मक उपाय
चड्ढा ने इस कानून के संभावित दुरुपयोग को लेकर भी चिंता जताई और इसके लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए:
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न्यूनतम हस्ताक्षर: किसी भी नेता को वापस बुलाने की प्रक्रिया तभी शुरू होनी चाहिए जब उस क्षेत्र के कम से कम 35 से 40 प्रतिशत मतदाता इसके पक्ष में हस्ताक्षर करें।
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परफार्मेंस विंडो: निर्वाचित प्रतिनिधि को काम साबित करने के लिए शुरुआत में कम से कम 18 महीने का समय दिया जाना चाहिए। इस अवधि के बाद ही ‘रिकॉल’ की प्रक्रिया संभव हो।
दुनिया भर में और भारत में स्थिति
राघव चड्ढा ने बताया कि अमेरिका, ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड, कनाडा और जापान जैसे 20 से अधिक लोकतांत्रिक देशों में यह व्यवस्था सफलतापूर्वक लागू है। भारत में भी मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में ग्राम पंचायत स्तर पर ‘राइट टू रिकॉल’ का अधिकार जनता के पास है। चड्ढा ने मांग की कि इसे अब राष्ट्रीय और राज्य स्तर (लोकसभा और विधानसभा) पर भी लागू करने का समय आ गया है।
