बलूचिस्तान: आज़ादी की अधूरी दास्तां और पांच विद्रोहों का खूनी इतिहास

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Balochistan

पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत आज जिस हिंसा और अलगाववाद की आग में जल रहा है, उसकी जड़ें 1947 के विभाजन और उसके बाद के घटनाक्रमों में छिपी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, यह संघर्ष महज कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र पहचान की लड़ाई है।

1. आज़ाद रियासत और धोखे का विलय (1947-1948)

आज़ादी से पहले बलूचिस्तान की ‘कौत का कलात’ रियासत ब्रिटिश हुकूमत के अधीन नहीं थी। 11 अगस्त 1947 को कलात के खान (शासक) ने अपनी आज़ादी की घोषणा की थी। हालांकि, मोहम्मद अली जिन्ना ने शुरू में इसे मान्यता दी, लेकिन 27 मार्च 1948 को पाकिस्तान ने सैन्य बल का प्रयोग कर कलात का खुद में विलय कर लिया। बलूच राष्ट्रवादियों के लिए यह आज भी एक ‘जबरन कब्जा’ है।

2. विद्रोह के पांच प्रमुख दौर

बलूचिस्तान में अब तक पांच बड़े सशस्त्र विद्रोह हो चुके हैं, जो पाकिस्तान की नींव को हिलाते रहे हैं:

  • पहला विद्रोह (1948): प्रिंस अब्दुल करीम खान ने पाकिस्तान के विलय के खिलाफ विद्रोह शुरू किया और अफगानिस्तान से गुरिल्ला युद्ध लड़ा।

  • दूसरा विद्रोह (1958-59): नवाब नौरोज खान ने पाकिस्तान की ‘वन यूनिट’ नीति (जिसमें छोटे प्रांतों की पहचान खत्म करने की कोशिश थी) के खिलाफ हथियार उठाए।

  • तीसरा विद्रोह (1962-63): अयूब खान के शासनकाल में नई सैन्य चौकियों की स्थापना के खिलाफ बलूच कबीलों ने संघर्ष किया।

  • चौथा विद्रोह (1973-77): जुल्फिकार अली भुट्टो द्वारा बलूचिस्तान की प्रांतीय सरकार को बर्खास्त करने के बाद यह सबसे बड़ा विद्रोह बना। पाकिस्तान ने इसे दबाने के लिए वायुसेना तक का इस्तेमाल किया।

  • पांचवां और वर्तमान विद्रोह (2004 से अब तक): 2006 में पाकिस्तान सेना द्वारा बलूच नेता नवाब अकबर बुगती की हत्या ने इस आग को और भड़का दिया। अब इसमें बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) जैसे संगठन सक्रिय हैं।

3. वर्तमान संकट के मुख्य कारण

  • संसाधनों की लूट: बलूचिस्तान गैस, कोयला और तांबे जैसे खनिजों से समृद्ध है, लेकिन वहां के लोग पाकिस्तान में सबसे गरीब हैं। बलूचों का आरोप है कि पंजाब (पाकिस्तान) उनके संसाधनों को लूट रहा है।

  • CPEC और चीन का हस्तक्षेप: चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) और ग्वादर पोर्ट प्रोजेक्ट ने बलूच विद्रोहियों को और नाराज कर दिया है। उन्हें डर है कि चीन उनकी ज़मीन पर कब्जा कर लेगा और उन्हें वहां से बेदखल कर दिया जाएगा।

  • मानवाधिकार उल्लंघन: पाकिस्तान सेना पर ‘गायब किए गए लोगों’ (Enforced Disappearances) और ‘मारो और फेंको’ (Kill and Dump) की नीति अपनाने के गंभीर आरोप हैं, जिससे स्थानीय आबादी में गहरी नफरत है।

बलूचिस्तान का मुद्दा अब केवल आंतरिक विद्रोह तक सीमित नहीं रह गया है। यह पाकिस्तान के अस्तित्व के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है, क्योंकि वहां की आज़ादी की मांग करने वाले समूह अब सीधे चीनी हितों और पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहे हैं।

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