क्या निशांत कुमार और आरसीपी सिंह संभालेंगे नीतीश की विरासत?
पटना। बिहार के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों जनता दल (यूनाइटेड) के भविष्य और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी को लेकर चर्चाएं तेज हैं। यह बहस न केवल राजनीतिक दलों के भीतर, बल्कि उन सामाजिक संस्थाओं और चिंतकों के बीच भी है जो ‘कुर्मी चेतना’ और नीतीश कुमार की जातीय जमीन को मजबूत मानते हैं। चर्चा के केंद्र में दो मुख्य नाम हैं—नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार और पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह।
कुर्मी समाज की मांग: “उत्तराधिकारी स्वजातीय ही हो”
राजनीतिक विश्लेषकों और कुर्मी समाज से जुड़ी संस्थाओं का मानना है कि नालंदा और मगध क्षेत्र की कुर्मी राजनीति अब नीतीश कुमार के बाद किसी अन्य जाति (कुशवाहा, चंद्रवंशी या सवर्ण) के नेता को स्वीकार करने के मूड में नहीं है। सामाजिक संगठनों का नीतीश कुमार पर दो प्रमुख बातों के लिए दबाव बढ़ रहा है:
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निशांत कुमार का पदार्पण: समाज चाहता है कि नीतीश कुमार के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में उनके पुत्र निशांत कुमार ही सामने आएं।
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आरसीपी सिंह की वापसी: एक कुशल संगठनकर्ता के रूप में आरसीपी सिंह की जदयू में वापसी हो, ताकि वे भविष्य में निशांत कुमार को सांगठनिक मजबूती प्रदान कर सकें।
आरसीपी सिंह: ‘साजिश के शिकार’ या ‘रणनीतिक जरूरत’?
आरसीपी सिंह को लेकर कुर्मी समाज में एक विशेष प्रकार की संवेदना देखी जा रही है। समाज के एक बड़े धड़े का मानना है कि आरसीपी सिंह सवर्ण नेताओं की साजिश का शिकार हुए हैं, जिन्होंने उनके और नीतीश कुमार के बीच दूरियां पैदा कीं।
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विक्टिम कार्ड: चर्चा है कि आरसीपी सिंह के बाहर होने के बाद उनके परिवार (बेटी और दामाद) को जिस तरह की प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा, उससे समाज उन्हें ‘विक्टिम’ के रूप में देख रहा है।
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बदले राजनीतिक समीकरण: जिस भाजपा से नजदीकी के आरोप में आरसीपी को पार्टी से दूर किया गया था, आज स्वयं नीतीश कुमार उसी गठबंधन का हिस्सा हैं। ऐसे में समाज का तर्क है कि अब आरसीपी सिंह की वापसी में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए।
कौन कर रहा है ‘लाइजनिंग’?
मीडिया रिपोर्ट्स और राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहा है कि क्या आरसीपी सिंह की वापसी के लिए पर्दे के पीछे से कोई अधिकारी वर्ग या सामाजिक संस्थाएं ‘लाइजनिंग’ (मध्यस्थता) कर रही हैं? यह माना जा रहा है कि कुर्मी जाति की छोटी-छोटी संस्थाएं नीतीश कुमार को सवर्ण नेताओं की ‘घेराबंदी’ से बाहर निकालकर उनके पुराने विश्वस्त साथियों को साथ लाने की कोशिश में जुटी हैं।
विशेषज्ञ की राय: “राजनीतिक जमीन बचाने की कवायद”
राजनीतिक विश्लेषक रामबंधु वत्स के अनुसार, “कुर्मी समाज की एकजुटता ही नीतीश कुमार की असली राजनीतिक शक्ति है। किसी भी जाति की स्वाभाविक इच्छा होती है कि उसका नेता स्वजातीय हो। यही कारण है कि अब निशांत कुमार को राजनीति में लाने और आरसीपी सिंह की घर वापसी का दबाव बढ़ रहा है। पहले जहाँ निशांत का नाम लेने पर कोपभाजन बनना पड़ता था, अब वहां परिस्थितियां बदल चुकी हैं।”
फिलहाल नीतीश कुमार राजनीति में सक्रिय हैं और कुर्मी समाज का एकमात्र वोट बैंक उन्हीं के पास है। लेकिन भविष्य की अनिश्चितताओं को देखते हुए, समाज अपनी राजनीतिक जमीन को सुरक्षित करने के लिए ‘परिवार’ और ‘पुराने वफादारों’ के गठजोड़ पर जोर दे रहा है।
