वाइकिंग बेबी: डेनमार्क की स्पर्म इंडस्ट्री के ‘सियाह पहलू’ का बड़ा खुलासा
कोपेनहेगन: दुनिया के सबसे खुशहाल देशों में शुमार डेनमार्क इन दिनों एक ऐसी खबर को लेकर चर्चा में है जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। 60 लाख की आबादी वाला यह छोटा सा देश दुनिया का सबसे बड़ा ‘स्पर्म एक्सपोर्टर’ (शुक्राणु निर्यातक) माना जाता है, लेकिन हाल ही में इस इंडस्ट्री के एक डरावने सच ने हजारों परिवारों की चिंता बढ़ा दी है।
एक डोनर और 197 बच्चे: कैंसर का बड़ा खतरा
हालिया जांच रिपोर्ट के अनुसार, एक ही स्पर्म डोनर ने 14 देशों की 67 क्लीनिकों के माध्यम से कम से कम 197 बच्चों को जन्म दिया। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस डोनर के स्पर्म में एक जेनेटिक म्यूटेशन (आनुवंशिक गड़बड़ी) थी, जो एक जानलेवा कैंसर से जुड़ी है।
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खतरनाक परिणाम: इस डोनर से पैदा हुए बच्चों में कैंसर का अत्यधिक खतरा है और उनमें से कुछ की मृत्यु भी हो चुकी है।
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लंबा सिलसिला: इस व्यक्ति ने साल 2005 में डोनेशन शुरू किया था और 17 सालों तक बिना किसी रोक-टोक के स्पर्म डोनेट करता रहा।
क्यों है ‘वाइकिंग स्पर्म’ की इतनी मांग?
डेनमार्क को दुनिया में स्पर्म डोनेशन का पावरहाउस कहा जाता है। यहाँ से निर्यात होने वाले स्पर्म को ‘वाइकिंग स्पर्म’ के नाम से जाना जाता है। दुनियाभर की महिलाएं डेनिश डोनर्स को प्राथमिकता देती हैं क्योंकि:
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जेनेटिक्स: लोग गोरे रंग और नीली आंखों वाले स्वस्थ ‘वाइकिंग बेबी’ की चाहत रखते हैं।
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पारदर्शिता: डोनर की प्रोफाइल में उनकी तस्वीरें और पूरी पृष्ठभूमि साझा की जाती है।
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आंकड़े: नीदरलैंड और बेल्जियम जैसे देशों में स्पर्म डोनेशन से पैदा होने वाले 60% बच्चों के जैविक पिता डेनिश पुरुष होते हैं।
बाजार का गणित: अरबों का कारोबार
डेनमार्क की इस इंडस्ट्री ने वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत पकड़ बना रखी है।
| विवरण | सांख्यिकी/जानकारी |
| वर्तमान बाजार मूल्य | करीब 1.3 अरब यूरो (यूरोप में) |
| 2033 तक अनुमानित मूल्य | 2.3 अरब यूरो |
| प्रति शीशी (Vial) कीमत | 100 से 1,000 यूरो (आधा मिलीलीटर) |
| सबसे बड़ा बैंक | क्रायोस इंटरनेशनल (100+ देशों में सप्लाई) |
निगरानी और कड़े कानूनों की मांग
कैंसर का मामला सामने आने के बाद स्पर्म डोनेशन के रेगुलेशन पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। डोनर्स की स्क्रीनिंग और डोनेशन की सीमा को लेकर लापरवाही उजागर हुई है।
“यूरोपीय संघ के अधिकारी अब एक अंतर्राष्ट्रीय रजिस्ट्री की मांग कर रहे हैं ताकि स्पर्म एक्सपोर्ट की कड़ी निगरानी की जा सके और भविष्य में ऐसी जेनेटिक बीमारियों को फैलने से रोका जा सके।”
यह घटना दिखाती है कि ‘खूबसूरत और स्वस्थ’ बच्चों के व्यवसाय के पीछे छिपी नियामक खामियां कितनी घातक साबित हो सकती हैं।
