पाकिस्तान का ‘यू-टर्न’: अफगानिस्तान के साथ व्यापार बहाल करने को तैयार
काबुल/इस्लामाबाद: अफगानिस्तान के साथ व्यापारिक रिश्तों पर लंबे समय तक अड़ियल रुख अपनाने के बाद पाकिस्तान अब आर्थिक दबाव के आगे झुकता नज़र आ रहा है। सोमवार को दोनों देशों के बीच व्यापारिक मार्ग (बॉर्डर) खोलने और द्विपक्षीय व्यापार को फिर से पटरी पर लाने के लिए बिजनेस लीडर्स की 13 सदस्यीय संयुक्त समिति के गठन की घोषणा की गई है।
समिति का स्वरूप और मुख्य उद्देश्य
‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ की रिपोर्ट के अनुसार, इस समिति में पाकिस्तान के 6 और अफगानिस्तान के 7 सदस्य शामिल हैं। पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे सैयद जवाद हुसैन काजमी ने वार्ता के एजेंडे को स्पष्ट किया:
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बॉर्डर खोलना: तोरखम और अन्य प्रमुख सीमा चौकियों को फिर से सक्रिय करना।
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बाधाओं को दूर करना: सीमा प्रबंधन और कागजी कार्रवाई में आने वाली अड़चनों का समाधान।
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स्थायी रोडमैप: व्यापारियों और आम जनता की समस्याओं के समाधान के लिए एक व्यावहारिक ढांचा तैयार करना।
क्यों बंद हुई थी सीमा? (पृष्ठभूमि)
दोनों देशों के बीच की सीमा पिछले साल अक्टूबर 2025 से पूरी तरह बंद है।
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टीटीपी (TTP) विवाद: पाकिस्तान ने आरोप लगाया था कि अफगानिस्तान में छिपे तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के आतंकी पाकिस्तानी सुरक्षाबलों पर हमले कर रहे हैं।
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सैन्य कार्रवाई: अक्टूबर में पाकिस्तान द्वारा किए गए हवाई हमलों के बाद दोनों पक्षों के बीच भीषण झड़पें हुईं, जिसके बाद सीमा सील कर दी गई।
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आर्थिक झटका: सीमा बंद होने से दोनों तरफ के व्यापारियों को अरबों रुपये का वित्तीय नुकसान हुआ है। तुर्की, कतर और यूएई ने मध्यस्थता की कोशिश की, लेकिन अब तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकला था।
विवाद की मुख्य जड़: TTP और सुरक्षा गारंटी
पाकिस्तान और तालिबान सरकार के बीच तनाव का सबसे बड़ा कारण सुरक्षा है।
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पाकिस्तान की मांग: पाकिस्तान चाहता है कि तालिबान सरकार लिखित में आश्वासन दे कि वह अपनी धरती का इस्तेमाल TTP को पाकिस्तान के खिलाफ नहीं करने देगी।
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तालिबान का रुख: अफगानिस्तान की तालिबान सरकार इस तरह के किसी भी लिखित वादे से इनकार करती आई है।
आर्थिक मजबूरी ने बदला रुख
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की बदहाल आर्थिक स्थिति और सीमावर्ती इलाकों के व्यापारियों के बढ़ते दबाव के कारण सरकार को अपना कड़ा रुख नरम करना पड़ा है। टीटीपी के मुद्दे पर समाधान न मिलने के बावजूद व्यापार खोलना पाकिस्तान के लिए एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक मजबूरी बन गया है।
