क्या रश्मि ठाकरे थीं राज-उद्धव की ‘खाई’ की असली वजह?

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udhav raj

मुंबई | विशेष रिपोर्ट | महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों एक बड़ी हलचल है—राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे का एक साथ आना। सालों तक एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे इन भाइयों के करीब आने की सबसे बड़ी वजह 74,000 करोड़ रुपये का बीएमसी (BMC) बजट माना जा रहा है। लेकिन, इस सियासी मिलन के पीछे की कहानी उतनी ही पुरानी है जितनी कि इनके बीच की ‘खाई’। 20 साल पहले जब राज ने शिवसेना छोड़ी थी, तब सुर्खियां कुछ और थीं। आइए जानते हैं उस पारिवारिक ड्रामे और उन किरदारों के बारे में जिन्होंने इन दो भाइयों को जुदा किया।

जब ‘विट्ठल’ के पुजारियों से भिड़ गए थे राज

तारीख थी 27 नवंबर 2005। राज ठाकरे के घर के बाहर समर्थकों का हुजूम था। राज ने माइक संभाला और एक ऐतिहासिक बयान दिया— “मेरा झगड़ा मेरे विट्ठल (बाला साहेब) से नहीं, बल्कि उनके आसपास के पुजारियों से है।” उन्होंने साफ़ कर दिया कि कुछ लोग राजनीति की ‘ABC’ नहीं जानते, फिर भी पार्टी पर हावी हैं। इसी के साथ उन्होंने शिवसेना से इस्तीफा दे दिया। 18 दिसंबर को उन्होंने दर्द छलकते हुए कहा, “मैने सिर्फ इज्जत मांगी थी, बदले में तिरस्कार मिला।”

1989: वो साल जब रश्मि पाटनकर ‘ठाकरे’ बनीं

राज और उद्धव के बीच मनमुटाव की शुरुआत असल में तब हुई जब राजनीति और परिवार में नए किरदारों का प्रवेश हुआ।

  • दोस्ती और रिश्ता: राज ठाकरे की सगी बहन जयवंती ठाकरे और रश्मि पाटनकर एलआईसी (LIC) में साथ काम करती थीं। जयवंती ने ही अपनी दोस्त रश्मि को अपने चचेरे भाई उद्धव से मिलवाया था।

  • शादी: 13 दिसंबर 1989 को उद्धव और रश्मि की शादी हुई। उस वक्त उद्धव एक फोटोग्राफर थे और राज पूरी तरह राजनीति में सक्रिय थे।

मातोश्री की ‘अघोषित’ जंग: रश्मि, स्मिता और शर्मिला

90 के दशक के उत्तरार्ध में ठाकरे परिवार के भीतर सत्ता के कई केंद्र बन गए थे।

  1. रश्मि ठाकरे: 1995 में मीनाताई (बाला साहेब की पत्नी) के निधन के बाद रश्मि ने बाला साहेब की देखरेख का जिम्मा संभाला और परिवार में अपना मुकाम बनाया।

  2. स्मिता ठाकरे: जयदेव ठाकरे की पत्नी स्मिता का उस समय पार्टी और सरकार में काफी दखल था।

  3. शर्मिला ठाकरे: राज ठाकरे की पत्नी शर्मिला और रश्मि के बीच भी अनबन की खबरें घर की चारदीवारी के भीतर चर्चा का विषय थीं।

जानकार बताते हैं कि उद्धव ठाकरे, जो अपनी एड एजेंसी और फोटोग्राफी में व्यस्त थे, उन्हें राजनीति में लाने और सक्रिय करने के पीछे रश्मि ठाकरे की बड़ी भूमिका थी।

महाबलेश्वर अधिवेशन: राज की ‘मजबूरी’ और उद्धव का ‘उदय’

30 जनवरी 2003 को शिवसेना के महाबलेश्वर अधिवेशन में सब कुछ बदल गया। शिवसैनिकों को उम्मीद थी कि राज ठाकरे उत्तराधिकारी बनेंगे, लेकिन बाला साहेब ने उद्धव को ‘कार्यकारी अध्यक्ष’ चुनने का मन बना लिया था।

  • कड़वा घूंट: बगावत रोकने के लिए बाला साहेब ने राज ठाकरे से ही उद्धव के नाम का प्रस्ताव रखवाया। राज ने भारी मन से इसे स्वीकार किया, लेकिन यहीं से अलगाव की नींव पड़ गई।

20 साल बाद फिर एक मोड़ पर खड़ी है राजनीति

2006 में ‘महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना’ (MNS) बनाने के बाद राज ने अपनी अलग राह चुनी। हालांकि, समय के साथ उनकी ताकत कम हुई। अब 2025 की दहलीज पर, जब बीएमसी के विशाल बजट और अस्तित्व की लड़ाई सामने है, तो दोनों भाई पुरानी कड़वाहट भुलाकर एक मंच पर आने की कोशिश कर रहे हैं।

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