धुरंधर: पर्दे पर नहीं मन के भीतर चलती है यह फिल्म

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प्रणय विक्रम सिंह (फेसबुक वाल से साभार )। कुछ फिल्में परदे पर चलती हैं, और कुछ मन के भीतर। ‘धुरंधर’ दूसरी तरह की फिल्म है। यह देखकर समाप्त नहीं होती, यह देखकर शुरू होती है।
हिंदी सिनेमा के शोरगुल, चमक-दमक और चीखती चुनौतियों के बीच ‘धुरंधर’ एक ऐसी फिल्म है जो फुसफुसाकर फतह करती है। यह शोर से नहीं, संयम से; संवाद से नहीं, दृष्टि से; और गति से नहीं, गहराई से वार करती है।
यह फिल्म मनोरंजन का उत्सव नहीं, बल्कि मनोविज्ञान का मंथन है, जहां हर दृश्य दर्पण है और हर दर्पण में दर्शक स्वयं को खड़ा पाता है।
‘धुरंधर’ की कथा बाहर से सरल, भीतर से सघन है। यह कहानी किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति की है जो सत्ता, सिस्टम और स्वार्थ के संगम से जन्म लेती है। यहां धुरंधर कोई उपनाम नहीं, एक अवस्था है, जहां व्यक्ति सत्य को तलवार नहीं बनाता, बल्कि तराजू बना लेता है। जहां वह झूठ नहीं बोलता, बल्कि सच को समय और सुविधा के अनुसार मोड़ देता है। यह कथा धीरे-धीरे खोलती है कि सबसे बड़ा षड्यंत्र शोर में नहीं, शांति में पलता है।
अक्षय खन्ना इस फिल्म में अभिनेता नहीं, एक अवधारणा हैं। उनका अभिनय आवाज़ नहीं उठाता, वह वातावरण बदल देता है। उनकी आंखे प्रश्न नहीं पूछतीं, परिणाम बता देती हैं। उनका मौन मंत्र है और उनका ठहराव मंत्रणा। एक संवाद कि हर सच कहने के लिए नहीं होता, कुछ सच सही जगह पर रखे जाते हैं, पूरे चरित्र का रूपक बन जाता है। वह व्यक्ति शब्दों से नहीं, संभावनाओं से खेलता है। यह अभिनय नहीं, आत्मसंयम की साधना है। यह भूमिका नहीं, मनोवृत्ति का निर्वहन है।
फिल्म के अन्य पात्र नायक के सामने खड़े विरोधी नहीं, उसके चारों ओर रखे आईने हैं। कोई सत्ता का स्वर है, कोई व्यवस्था की विवशता, कोई नैतिकता का मुखौटा, कोई भय का भविष्य और कोई साधारण मनुष्य जो समझना चाहता है कि गलत कहां शुरू हुआ।
एक स्त्री पात्र का संवाद कि ‘आप जीत की बात ऐसे करते हैं जैसे किसी की हार की कोई कीमत ही न हो’, फिल्म की नैतिक नस पर उंगली रख देता है। यह संवाद कथानक का नहीं, काल का कथ्य बन जाता है।
‘धुरंधर’ संवादों की नहीं, संवाद-विरामों की फिल्म है। यहां शब्दों के बीच का सन्नाटा सबसे ऊंचा बोलता है। कैमरा जब चेहरे पर ठहरता है, तब कथा गति नहीं खोती, बल्कि गहराई पाती है। एक और संवाद कि ‘सिस्टम गंदा नहीं होता, उसे चलाने वाले हाथ गंदे हो जाते हैं’, पूरे कथानक को व्यक्ति से ऊपर उठाकर संरचना पर केंद्रित कर देता है। यही वह क्षण है, जहां फिल्म अपराध कथा नहीं, सभ्यता समीक्षा बन जाती है।
निर्देशन में संयम ही सौंदर्य है। न अनावश्यक संगीत, न जबरदस्ती के मोड़, न भावनात्मक ब्लैकमेल। निर्देशक दर्शक को उपदेश नहीं देता, उसे सोचने का साहस देता है। पटकथा नदी की तरह बहती है, कहीं शांत, कहीं गहरी, कहीं खतरनाक लेकिन कहीं भी बनावटी नहीं। यहां हर दृश्य या तो चरित्र खोलता है या विचार को धार देता है।
वैचारिक रूप से ‘धुरंधर’ आज के समय का सटीक ‘सोशल- साइकोलॉजिकल’ रूपक है। यह उस युग की कथा है जहां इंटेलिजेंस को इंटीग्रिटी से ऊपर बैठाया जा रहा है और सफलता को सत्य का सर्टिफिकेट मान लिया गया है। फिल्म पूछती है कि क्या हर जीत न्याय है? क्या व्यवस्था के भीतर रहकर व्यवस्था को मात देना वास्तव में सुधार कहलाता है? क्या बुद्धिमत्ता करुणा के बिना केवल एक औज़ार बन जाती है? और क्या हर सफल व्यक्ति भीतर से पराजित हो सकता है? ये प्रश्न फिल्म छोड़ देती है, क्योंकि उत्तर देना दर्शक की ज़िम्मेदारी है।
यह फिल्म स्वीकार करती है कि वह सबके लिए नहीं है। जो दर्शक फास्ट-पेस्ड एंटरटेनमेंट और क्लियर-कट हीरोइज़्म चाहते हैं, उन्हें यह धीमी लगेगी। लेकिन जो सिनेमा को विचार, विवेक और आत्मपरीक्षण की विधा मानते हैं, उनके लिए ‘धुरंधर’ एक कोल्ड, क्लियर और लॉन्ग-लास्टिंग इम्पैक्ट छोड़ने वाली फिल्म है।
अंततः ‘धुरंधर’ तलवार नहीं चलाती, शतरंज बिछाती है। यह फिल्म बताती है कि सबसे घातक वार वही होता है जो बिना आवाज़ के किया जाए। अक्षय खन्ना इस फिल्म के केंद्र में नहीं, उसकी चेतना में हैं। ‘धुरंधर’ देखी नहीं जाती, वह धीरे-धीरे दिमाग़ में उतरती है, और बहुत देर तक वहां रहती है।

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