IAS डी. सुरेश पर FIR, 3.5 करोड़ के प्लॉट को 6.71 लाख में देने का आरोप

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ias d Suresh

गुरुग्राम। हरियाणा के वरिष्ठ IAS अधिकारी डी. सुरेश के खिलाफ रिटायरमेंट से महज पांच दिन पहले भ्रष्टाचार के एक गंभीर मामले में FIR दर्ज होने से प्रशासनिक हलकों में हलचल मच गई है। एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने गुरुग्राम के सेक्टर-23 स्थित HSVP के 500 वर्ग गज के प्लॉट से जुड़े कथित अनियमितता के मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम समेत संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है।

आरोप है कि जिस प्लॉट की बाजार कीमत करीब 3.5 करोड़ रुपये और कलेक्टर रेट लगभग 1.75 करोड़ रुपये बताया गया, उसे महज 6.71 लाख रुपये में बहाल कर कन्वेयंस डीड कराए जाने की प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी हुई। ACB की कार्रवाई में डी. सुरेश समेत कुल नौ लोगों को आरोपी बनाया गया है।

1988 के डिफॉल्ट प्लॉट से जुड़ा मामला

जांच के मुताबिक मामले की शुरुआत वर्ष 1988 में आवंटित एक प्लॉट से हुई थी। बकाया भुगतान नहीं होने के कारण HSVP ने वर्ष 2002 में प्लॉट को जब्त कर लिया था। आरोप है कि बाद में अधिकारियों और कर्मचारियों ने किसी दूसरे प्लॉट से संबंधित अदालत के आदेश को आधार बनाकर कथित तौर पर नोटशीट तैयार की और जब्त प्लॉट की बहाली का रास्ता तैयार किया।

ACB के अनुसार, मार्च 2019 में तत्कालीन चीफ एडमिनिस्ट्रेटर के पद पर रहे डी. सुरेश की भूमिका भी इस प्रक्रिया में सामने आई है। आरोप है कि इसी दौरान प्लॉट की जब्ती हटाने और कम कीमत पर कन्वेयंस डीड कराने की कार्रवाई हुई, जिससे सरकारी खजाने को कथित तौर पर करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ।

नौ लोग FIR में आरोपी

इस मामले में तत्कालीन संपदा अधिकारी मुकेश कुमार समेत कुल नौ लोगों को आरोपी बनाया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक FIR मुख्य सचिव की मंजूरी के बाद 26 अगस्त 2026 को दर्ज की गई थी। इसके कुछ ही दिन बाद 31 अगस्त को डी. सुरेश सेवानिवृत्त हुए।

हाईकोर्ट से अंतरिम राहत

FIR के बाद मामले ने कानूनी मोड़ भी ले लिया। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने डी. सुरेश को अंतरिम राहत देते हुए कहा है कि उन्हें हिरासत में लेने से पहले कम से कम सात दिन का नोटिस दिया जाए। मामले की अगली सुनवाई 16 अक्टूबर को निर्धारित है।

यह मामला फिलहाल जांच के स्तर पर है और FIR में लगाए गए आरोपों की न्यायिक पुष्टि होना बाकी है। ACB की जांच में यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि प्लॉट की बहाली और उसके बाद की संपत्ति संबंधी कार्रवाई में किस स्तर पर नियमों का उल्लंघन हुआ और इससे सरकारी खजाने को वास्तविक वित्तीय नुकसान कितना हुआ।

 

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