Sanchar Nest: फ्लैट, फंड और फाइलों के बीच उलझा पूरा सिस्टम
गाजियाबाद। Sanchar Nest Sahkari Awas Samiti Ltd. का विवाद अब महज फ्लैट की रजिस्ट्री या ₹400 प्रति वर्गफुट अतिरिक्त शुल्क तक सीमित नहीं रह गया है। करीब 17 साल पुराने इस प्रोजेक्ट में पैसे की वसूली, निर्माण की गति, सदस्यता रिकॉर्ड, फ्लैटों के आवंटन और पुनःआवंटन, बैंक खातों, कर्ज, ठेकों और रजिस्ट्री के लिए जमा रकम के इस्तेमाल तक पर सवाल खड़े हो गए हैं।
समिति के खिलाफ शिकायतों में उठाए गए सवालों के बाद मामला उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद (UPAVP), सहकारी विभाग और अब उत्तर प्रदेश विधान परिषद की संसदीय एवं सामाजिक सद्भाव समिति तक पहुंच चुका है। शासन स्तर पर भी जांच के आदेश दिए जाने की खबर सामने आ चुकी है। 31 जुलाई 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रमुख सचिव पी. गुरुप्रसाद ने जिलाधिकारी गाजियाबाद की अध्यक्षता में चार सदस्यीय जांच समिति गठित कर एक माह में रिपोर्ट मांगी थी। रिपोर्ट में सदस्यता और फ्लैट मालिकों की सूची में विसंगतियों के चलते करीब 200 फ्लैटों की जांच का उल्लेख भी है।
2009 की शुरुआत, 2026 में भी सवालों का अंत नहीं
समिति का पंजीकरण वर्ष 2009 में हुआ था। मूल परियोजना को लेकर विवाद के बाद सदस्यों को वेव सिटी के Palm Wood Enclave प्रोजेक्ट में स्थानांतरित किया गया। दस्तावेजों के मुताबिक शुरुआती वर्षों में करीब 2012-13 तक कब्जे की उम्मीद थी, लेकिन परियोजना आगे खिसकती चली गई। इसी दौरान फ्लैटों की संख्या 488 से बढ़कर 506 होने और लागत में लगातार बदलाव को लेकर भी सवाल उठे।
दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग के 8 जून 2026 के एक आदेश में भी दो सदस्यों के मामले में लंबे समय तक कब्जा न मिलने का विवाद सामने आया। आयोग ने कुल ₹79,43,099 की जमा राशि के रिफंड से संबंधित राहत दी और मामले में कब्जा न दिए जाने के लंबे अंतराल को दर्ज किया।
सबसे बड़ा सवाल—पैसा गया कहां?
प्रतिनिधित्व में सबसे गंभीर सवाल समिति के आय-व्यय और फंड के इस्तेमाल को लेकर हैं।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि अलग-अलग समय पर सदस्यों से निर्माण, अतिरिक्त क्षेत्र, पार्किंग, विद्युतीकरण, रखरखाव, रजिस्ट्रेशन और अन्य मदों में रकम मांगी गई। लेकिन दूसरी तरफ यह सवाल उठाया गया कि परियोजना-वार कितना पैसा आया, कितना खर्च हुआ, किस बैंक खाते में रखा गया और किस मद में भुगतान किया गया—इसका स्पष्ट, परियोजना-वार मिलान क्यों उपलब्ध नहीं कराया गया।
कई बैंक खातों और कथित अंतर-परियोजना धन हस्तांतरण को लेकर भी स्वतंत्र ऑडिट की मांग की गई है। शिकायत में मांग है कि प्रत्येक खाते के बैंक स्टेटमेंट, लेजर, वाउचर, लोन अकाउंट और भुगतान रिकॉर्ड को मिलाकर यह स्पष्ट किया जाए कि किस सदस्य से आया पैसा आखिर किस काम में लगा।
₹400 प्रति वर्गफुट की बढ़ोतरी—किस आधार पर?
विवाद का एक बड़ा केंद्र ₹400 प्रति वर्गफुट का कथित अतिरिक्त शुल्क है।
दिसंबर 2024 की AGM के संबंध में प्रतिनिधित्व में दावा किया गया कि प्रबंधन की ओर से इस बढ़ोतरी को सोसाइटी के कर्ज को समाप्त करने से जोड़ा गया। लेकिन सदस्यों की ओर से यह सवाल उठाया गया कि क्या प्रस्ताव वास्तव में नियमानुसार पारित हुआ था और सोसाइटी पर वास्तविक कर्ज कितना था।
और यहीं एक और बड़ा सवाल सामने आता है—कथित रूप से कर्ज का आंकड़ा लगभग ₹23 करोड़ से बढ़कर करीब ₹44.85 करोड़ तक पहुंचने की बात क्यों सामने आई? यह राशि किस-किस ऋण, ब्याज और देनदारी से बनी? किस संपत्ति को सुरक्षा के रूप में रखा गया? और इसके लिए General Body की क्या-क्या मंजूरियां ली गईं?
इन सवालों का निर्णायक उत्तर स्वतंत्र विशेष ऑडिट से ही सामने आ सकता है।
रजिस्ट्री के पैसे पर भी उठे सवाल
2024 में सदस्यों से रजिस्ट्री और स्टांप ड्यूटी के नाम पर बड़ी रकम जमा किए जाने का मामला भी प्रतिनिधित्व में प्रमुखता से उठाया गया है।
दावे के अनुसार संबंधित अवधि में लगभग 180-185 फ्लैटों की रजिस्ट्री ही पूरी हो पाई थी। शिकायत में यह आरोप भी दर्ज है कि प्रबंधन से जुड़े लोगों की ओर से ऐसी बातें कही गईं कि रजिस्ट्री के लिए जमा पैसा C Block के निर्माण में इस्तेमाल हुआ।
यह आरोप बेहद गंभीर है, लेकिन इसे स्वतंत्र ऑडिट से सत्यापित किया जाना बाकी है।
इसलिए जांच का सीधा सवाल होना चाहिए—
सदस्यों से रजिस्ट्री के लिए कुल कितनी रकम ली गई? सरकार के खाते में कितनी जमा हुई? कितनी रजिस्ट्री हुई? कितना पैसा बचा? और बची रकम किस खाते में रही तथा उसका इस्तेमाल कहां हुआ?
506 फ्लैट और सदस्य कितने?
एक और चौंकाने वाला मुद्दा सदस्यता और फ्लैटों की वास्तविक संख्या को लेकर है।
शिकायतकर्ताओं के अनुसार अलग-अलग समय की सूचियों में सदस्यों की संख्या और उपलब्ध फ्लैटों की संख्या में स्पष्टता नहीं दिखाई देती। लगभग 506 फ्लैटों के मुकाबले करीब 490 सदस्यों की सूची और 100 से अधिक कथित रिक्त इकाइयों का सवाल उठाया गया है। C Block में 184 फ्लैटों के मुकाबले 80-90 सदस्यों की संख्या बताए जाने पर भी सवाल खड़े हुए हैं।
खाली फ्लैट या ‘इन्वेंटरी’—किसके लिए?
शिकायतकर्ताओं ने यह भी सवाल उठाया है कि जिन फ्लैटों के सदस्य या खरीदार स्पष्ट नहीं हैं, उनका वित्तीय भार किस पर पड़ रहा है।
यदि कुछ सदस्य भुगतान नहीं कर रहे थे और कुछ फ्लैट खाली थे, तो निर्माण लागत और ऋण का भार नियमित भुगतान करने वाले सदस्यों पर किस आधार पर डाला गया? क्या खाली फ्लैटों को बेचकर पैसा जुटाया गया? यदि हां, तो बिक्री की अनुमति किसने दी, कीमत कैसे तय हुई और पैसा सोसाइटी के खाते में कैसे दर्ज हुआ?
2019 में अतिरिक्त जमीन/स्पेस से कमाई, फिर भी सवाल कायम
2019 में अतिरिक्त क्षेत्र/स्पेस की नीलामी या बिक्री से रकम जुटाए जाने का भी उल्लेख मिलता है। शिकायतकर्ताओं ने सवाल उठाया है कि इस मद से कितनी रकम आई और वह कहां खर्च हुई। यदि इस आय का इस्तेमाल परियोजना के निर्माण के लिए हुआ, तो उसके दस्तावेज और भुगतान रिकॉर्ड सदस्यों के सामने क्यों नहीं हैं—यह भी जांच का विषय है।
प्रबंधन और ठेकेदार—क्या हितों का टकराव हुआ?
जांच की मांग केवल पैसों तक सीमित नहीं है। शिकायतकर्ताओं ने यह गंभीर सवाल भी उठाया है कि क्या सोसाइटी के कुछ पदाधिकारी या उनसे जुड़े लोग ठेकेदार, सप्लायर या संपत्ति के लाभार्थी की भूमिका में भी रहे।
ऐसे मामलों में जांच के लिए टेंडर, कोटेशन, तुलनात्मक दरें, वर्क ऑर्डर, भुगतान वाउचर और संबंधित व्यक्तियों की संपत्ति/सदस्यता का रिकॉर्ड मिलाना जरूरी होगा।
सवाल यह नहीं है कि कोई सदस्य ठेकेदार क्यों हो सकता है। सवाल यह है कि ठेका किस प्रक्रिया से मिला, प्रतिस्पर्धी दरें क्या थीं, काम की वास्तविक लागत कितनी थी और भुगतान किसे किया गया।
UPAVP की कार्रवाई ने बढ़ाई गंभीरता
मामला तब और गंभीर हुआ जब UPAVP की ओर से हस्तक्षेप शुरू हुआ। शिकायतकर्ताओं के अनुसार जनवरी 2026 में सोसाइटी के फ्लैटों की बिक्री-खरीद तथा बैंक खातों के संचालन पर रोक संबंधी आदेश का उल्लेख है। इसके बाद 8 मार्च 2026 को UPAVP की निगरानी में EGBM हुई।
इस बैठक में विशेष ऑडिट, मूल रिकॉर्ड UPAVP को उपलब्ध कराने, मौजूदा प्रबंधन समिति को हटाने और प्रशासक नियुक्त करने जैसे प्रस्तावों पर मतदान हुआ। प्रतिनिधित्व के अनुसार प्रबंधन समिति को हटाने के पक्ष में 112 और विरोध में 37 वोट पड़े, जबकि प्रशासक के पक्ष में 123 और विरोध में 5 वोट बताए गए हैं।
अब असली परीक्षा—मूल रिकॉर्ड कहां हैं?
पूरे विवाद की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी मूल दस्तावेज हैं।
विशेष ऑडिट के लिए केवल तैयार की गई रिपोर्ट काफी नहीं होगी। मूल बैंक स्टेटमेंट, कैशबुक, लेजर, वाउचर, मीटिंग मिनट्स, सदस्यता रजिस्टर, आवंटन पत्र, कैंसिलेशन रिकॉर्ड, पुनःआवंटन दस्तावेज, बिक्री रिकॉर्ड, निर्माण अनुबंध और भुगतान संबंधी दस्तावेजों की जरूरत होगी।
यही वजह है कि शिकायतकर्ताओं ने रिकॉर्ड को सुरक्षित कराने और स्वतंत्र जांच की मांग की है।
अब विधान परिषद की नजर में मामला
यह मामला अब केवल सोसाइटी के सदस्यों की आपसी शिकायत नहीं रह गया है। 31 जुलाई 2026 को सामने आई रिपोर्ट के अनुसार प्रमुख सचिव स्तर पर जांच समिति गठित की गई और आरोपों की जांच के लिए एक माह में रिपोर्ट मांगी गई। रिपोर्ट में सदस्यता और फ्लैट मालिकों की सूचियों में विसंगतियों का उल्लेख करते हुए करीब 200 फ्लैटों की जांच का निर्णय भी बताया गया है।
इससे पहले UPAVP स्तर पर भी विशेष ऑडिट और प्रशासनिक कार्रवाई की दिशा में कदम उठाए जा चुके हैं।
सबसे बड़ा सवाल: 17 साल का पूरा हिसाब कब खुलेगा?
Sanchar Nest की आधिकारिक वेबसाइट परियोजना को सहकारी संस्था द्वारा नो-प्रॉफिट-नो-लॉस के सिद्धांत पर संचालित बताते हुए सदस्यों को आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने की बात करती है। वेबसाइट पर Tower A और B के कब्जे तथा रजिस्ट्री शुरू होने और Tower C में कब्जा शुरू होने की जानकारी भी दी गई है।
लेकिन शिकायतों और सरकारी स्तर पर शुरू हुई जांच ने इससे अलग कई सवाल खड़े किए हैं।
अब जरूरत किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम का दस्तावेजी ऑडिट कराने की है।
Sanchar Nest का विवाद अब एक फ्लैट, एक सदस्य या ₹400 की अतिरिक्त वसूली का मामला नहीं दिखाई देता। उपलब्ध दस्तावेजों में वर्षों से चली आ रही देरी, लागत वृद्धि, सदस्यता रिकॉर्ड, रिक्त फ्लैट, रजिस्ट्री राशि, कर्ज, बैंक खातों, ठेकों और प्रबंधन की भूमिका से जुड़े कई सवाल दर्ज हैं।
इनमें से कौन-सा आरोप सही है और कौन-सा गलत—इसका अंतिम फैसला जांच और ऑडिट से ही होना चाहिए। लेकिन एक बात साफ है:
अगर 2009 से 2026 तक का पूरा बैंकिंग, सदस्यता और फ्लैट-वार रिकॉर्ड स्वतंत्र जांच में एक साथ खोल दिया गया, तो Sanchar Nest की पूरी वित्तीय और प्रशासनिक कहानी सामने आ सकती है।
