महाशिवरात्रि 2026: घर पर महादेव को प्रसन्न करने के ये हैं सरल नियम

0
Mahashivratri (2)

नई दिल्ली | सनातन परंपरा में भगवान शिव को सबसे उदार और शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है। वे किसी बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा और सरल भाव से प्रसन्न होते हैं। आगामी महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर भक्त घर पर ही महादेव की आराधना कर सकते हैं, जिसके लिए शास्त्रों में कुछ सरल लेकिन महत्वपूर्ण नियम बताए गए हैं।

पूजा का उत्तम समय और शुद्धि

महादेव की दैनिक या विशेष पूजा के लिए प्रातःकाल का समय, विशेषकर ब्रह्म मुहूर्त सबसे फलदायी माना गया है। यदि ब्रह्म मुहूर्त संभव न हो, तो सूर्योदय के बाद स्नान कर साफ वस्त्र धारण करके पूजा करनी चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, शिव पूजा में बाहरी स्वच्छता के साथ-साथ आंतरिक शुद्धि (मन की शांति) अत्यंत आवश्यक है। क्रोध या तनावपूर्ण स्थिति में की गई पूजा को उचित नहीं माना गया है।

शिवलिंग स्थापना के नियम

  • आकार: घर में अंगूठे की ऊंचाई के बराबर छोटा शिवलिंग रखना ही श्रेष्ठ माना जाता है।

  • पात्र: शिवलिंग को हमेशा एक थाली या पात्र में स्थापित करना चाहिए ताकि अभिषेक का जल इधर-उधर न बहे।

  • प्रकार: गृहस्थों के लिए नर्मदेश्वर, पत्थर या धातु से बना शिवलिंग शुभ होता है।

अभिषेक और पूजन सामग्री

शिव पूजा का मूल तत्व जलाभिषेक है। स्वच्छ जल या गंगाजल से अभिषेक करते समय जल की धारा निरंतर शिवलिंग के ऊपर से बहनी चाहिए। महाशिवरात्रि जैसे विशेष अवसरों पर दूध, दही या पंचामृत का प्रयोग भी किया जा सकता है।

  • बेलपत्र: तीन पत्तियों वाला अखंडित (बिना कटा-फटा) बेलपत्र अर्पित करें। चढ़ाते समय पत्ते की डंठल शिवलिंग की ओर होनी चाहिए।

  • पुष्प: शिवजी को सफेद रंग के फूल, आक और धतूरा विशेष रूप से प्रिय हैं। ध्यान रहे कि शिव पूजा में केतकी के फूल का प्रयोग वर्जित है।

  • मंत्र: पूजा के दौरान ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जप सबसे प्रभावशाली माना जाता है।

इन बातों का रखें विशेष ध्यान

शास्त्रों के अनुसार, शिव पूजा में कुछ सावधानियां भी जरूरी हैं:

  1. तुलसी वर्जित: भगवान शिव की पूजा में कभी भी तुलसी के पत्ते नहीं चढ़ाने चाहिए।

  2. शाम को जलाभिषेक नहीं: शाम के समय पूजा की जा सकती है, लेकिन इस समय शिवलिंग पर जल नहीं चढ़ाना चाहिए।

  3. भाव की प्रधानता: महादेव विधि-विधान से अधिक भक्त के भाव से प्रसन्न होते हैं। द्वेष या ईर्ष्या का भाव त्याग कर की गई पूजा ही सफल होती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *