सोने से भी महंगी है इस पेड़ की लकड़ी

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Agarwood

नई दिल्ली: बजट 2026-27 में केंद्र सरकार ने कृषि क्षेत्र को आधुनिक बनाने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण में ‘अगरवुड’ (Agarwood) की खेती को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रावधानों का ऐलान किया है। सरकार ने इस बार कृषि क्षेत्र के लिए कुल 1,62,671 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया है, जिसमें उत्तर-पूर्वी राज्यों में अगरवुड की खेती पर विशेष ध्यान दिया गया है।

क्यों है यह पेड़ इतना खास?

अगरवुड को ‘ऊद’ (Oud) के नाम से भी जाना जाता है। इसकी खासियत यह है कि इसकी लकड़ी की कीमत सोने से भी अधिक होती है। रिपोर्ट के अनुसार, उच्च गुणवत्ता वाली अगरवुड की एक किलो लकड़ी की कीमत 70 लाख रुपये से भी ज्यादा हो सकती है। वहीं, इससे निकलने वाले ‘ऊद तेल’ की कीमत करीब 9,000 रुपये प्रति ग्राम तक होती है।

कैसे बनता है कीमती ‘ऊद’?

यह सुगंधित राल (Resin) तब बनती है जब एक्विलेरिया प्रजाति के पेड़ किसी फंगल संक्रमण या चोट से प्रभावित होते हैं। पेड़ अपनी सुरक्षा के लिए जो प्रतिक्रिया करता है, उसी से यह बेशकीमती राल तैयार होती है। इसका उपयोग दुनिया के सबसे महंगे इत्र (Perfumes) और पारंपरिक दवाओं में सदियों से किया जा रहा है।

उत्तर-पूर्व से लेकर तटीय राज्यों तक विस्तार

प्राकृतिक रूप से यह पेड़ असम, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड और मणिपुर जैसे उत्तर-पूर्वी राज्यों में पाया जाता है। लेकिन अब सरकार की नई नीतियों के तहत इसकी जैविक खेती को केरल, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में भी प्रोत्साहित किया जा रहा है, जहाँ की जलवायु इसके अनुकूल है।

किसानों के लिए मुनाफे का सौदा

सरकार का मानना है कि अगरवुड की खेती को बढ़ावा देने से न केवल ग्रामीण इलाकों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, बल्कि यह किसानों की किस्मत बदलने में भी सहायक सिद्ध होगा। बजट में आधुनिक तकनीक और नई रणनीतियों के जरिए इस कीमती लकड़ी के व्यापार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती देने का लक्ष्य रखा गया है।

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