GUDA के सरकारी आवासों में चल रहा किराए का ‘काला खेल’
गांधीनगर। गुजरात की राजधानी में गांधीनगर शहरी विकास प्राधिकरण (GUDA) के आवासों के दुरुपयोग का एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। सरकारी योजनाओं का लाभ उठाकर गरीबों के लिए बनाए गए घर अब कमाई का जरिया बन गए हैं। जांच और सूत्रों के हवाले से पता चला है कि जिन लोगों ने खुद को आर्थिक रूप से कमजोर बताकर ये फ्लैट आवंटित कराए थे, वे खुद वहां रहने के बजाय उन्हें व्यावसायिक लाभ के लिए किराए पर चला रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इस धांधली की शिकायत बार-बार किए जाने के बावजूद अब तक प्रशासन की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
गरीब बनकर लिया फ्लैट, अब वसूल रहे किराया
मामले का खुलासा तब हुआ जब यह जानकारी सामने आई कि कई आवंटियों (Allottees) ने धोखाधड़ी से खुद को पात्र बताकर फ्लैट हासिल किए। लेकिन सच्चाई यह है कि ये लोग इन फ्लैटों में खुद नहीं रह रहे हैं। इसके बजाय, इन्होंने उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों से आए प्रवासी मजदूरों और अन्य लोगों को ये मकान किराए पर दे दिए हैं।
नियमों और सुरक्षा की सरेआम अनदेखी
गांधीनगर शहरी विकास प्राधिकरण के स्पष्ट नियम हैं कि ये आवास केवल और केवल उन पात्र परिवारों के स्वयं रहने के लिए हैं जो आर्थिक रूप से पिछड़े हैं। इन मकानों को किराए पर देना या इनका व्यावसायिक उपयोग करना पूरी तरह प्रतिबंधित है।
इस मामले में न केवल नियमों का उल्लंघन हुआ है, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था के साथ भी खिलवाड़ किया जा रहा है:
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बिना वेरिफिकेशन किराएदार: मकान मालिकों ने दूसरे राज्यों से आए इन किराएदारों की कोई भी जानकारी पुलिस को नहीं दी है।
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पुलिस वेरिफिकेशन का अभाव: किसी भी किराएदार का पुलिस वेरिफिकेशन नहीं कराया गया है, जो राजधानी जैसे संवेदनशील इलाके की सुरक्षा के लिए एक बड़ी लापरवाही है।
उठ रहे हैं गंभीर सवाल
यह मामला सामने आने के बाद अब प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय निवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग है कि प्रशासन तुरंत इन आवासों का फिजिकल वेरिफिकेशन (भौतिक सत्यापन) कराए और नियमों का उल्लंघन करने वाले आवंटियों के फ्लैट रद्द कर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।
शिकायतों पर भी नहीं जागा प्रशासन
इस पूरे मामले में सबसे बड़ी लापरवाही प्रशासन के स्तर पर देखी जा रही है। जानकारी के अनुसार: “कई सामाजिक संगठनों और पत्रकारों ने इस धांधली के संबंध में साक्ष्यों के साथ प्राधिकरण से शिकायत की है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि बार-बार गुहार लगाने के बाद भी अभी तक प्रशासन की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई है।”
प्रशासन की इस चुप्पी ने अब कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या अधिकारियों की मिलीभगत से यह खेल चल रहा है? या फिर जानबूझकर गरीबों के हक की अनदेखी की जा रही है?
प्रशासन से सीधे सवाल
इस मामले में सामाजिक संगठनों और मीडिया द्वारा बार-बार आवाज उठाने के बाद भी प्रशासन का मौन रहना कई गंभीर सवाल खड़े करता है:
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अंधेरगर्दी क्यों? जब GUDA के नियम स्पष्ट हैं कि आवास किराए पर नहीं दिए जा सकते, तो खुलेआम चल रहे इस ‘रेंट रैकेट’ पर अधिकारी आँखें क्यों मूँदे बैठे हैं?
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सुरक्षा का जिम्मेदार कौन? गांधीनगर प्रदेश की राजधानी है और यहाँ के वीवीआईपी (VVIP) इलाकों के पास बिना पुलिस वेरिफिकेशन के सैकड़ों लोग रह रहे हैं; अगर कोई अप्रिय घटना होती है, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
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शिकायतों पर चुप्पी क्यों? पत्रकारों और सामाजिक संगठनों द्वारा सबूतों के साथ की गई शिकायतों को ठंडे बस्ते में क्यों डाल दिया गया है? क्या इसमें किसी रसूखदार व्यक्ति या विभागीय कर्मचारी की मिलीभगत है?
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गरीबों का हक कब तक मरेगा? असल हकदार आज भी झुग्गियों में रहने को मजबूर हैं, जबकि ‘फर्जी गरीबों’ ने फ्लैट लेकर उसे कमाई का जरिया बना लिया है। प्रशासन इन आवंटनों को रद्द क्यों नहीं कर रहा?
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फिजिकल वेरिफिकेशन क्यों नहीं? क्या प्रशासन साल में एक बार भी इन फ्लैटों का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) करने की जहमत उठाता है? यदि नहीं, तो इस लापरवाही का क्या कारण है?
