सिंधु जल संधि पर भारत की ‘चोट’ से थर्राया पाकिस्तान

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Indus Water Treaty

नई दिल्ली/इस्लामाबाद: जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए कायराना आतंकी हमले के जवाब में भारत द्वारा सिंधु जल संधि को स्थगित किए जाने के फैसले ने पाकिस्तान को उस गहरे संकट में डाल दिया है, जिसका सामना उसने पिछले छह दशकों में कभी नहीं किया था। अप्रैल 2025 में लिए गए इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद से पाकिस्तान न केवल अपनी जल सुरक्षा को लेकर घबराया हुआ है, बल्कि दुनिया भर के मंचों पर ‘पानी की युद्ध’ का नैरेटिव फैलाने की कोशिश कर रहा है।

ऐतिहासिक फैसला: जब रुका 60 साल पुराना पानी का सफर

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम के बैसरन वैली में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने 26 लोगों की जान ले ली थी। इसके ठीक एक दिन बाद, 23 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने 1960 की सिंधु जल संधि को ‘स्थगित’ (Abeyance) करने का निर्णय लिया। भारत ने स्पष्ट कर दिया कि “खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते”।

पाकिस्तान की घबराहट की असली वजह

इस्लामाबाद की इस कदर बौखलाहट के पीछे गंभीर आर्थिक और भौगोलिक कारण हैं:

  • खेती पर संकट: पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांत की 80 से 90 प्रतिशत कृषि सीधे तौर पर भारत से आने वाले पानी पर निर्भर है।

  • सीमित भंडारण क्षमता: पाकिस्तान की पानी रोकने की क्षमता मात्र 30 दिनों की है, जिससे वह लंबे समय तक पानी की कमी झेलने की स्थिति में नहीं है।

  • ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा: सिंधु प्रणाली की नदियों पर पाकिस्तान के कई बड़े बांध (तरबेला और मंगला) निर्भर हैं, जिनसे बिजली उत्पादन प्रभावित हो रहा है।

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नैरेटिव की जंग

भारत के फैसले के बाद पाकिस्तान ने इसे “युद्ध की घोषणा” करार दिया और वैश्विक समुदाय का दरवाजा खटखटाया है:

  • वैश्विक गुहार: पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC), महासभा (UNGA), इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC), और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) को पत्र लिखकर भारत के कदम का विरोध किया है।

  • विश्व बैंक का रुख: संधि के संरक्षक के रूप में पाकिस्तान ने विश्व बैंक से भी हस्तक्षेप की मांग की है, इसे 24 करोड़ लोगों की जान के लिए खतरा बताया है।

भारत का रुख: आतंक मुक्त माहौल ही समाधान

भारत ने साफ कर दिया है कि यह संधि तब तक स्थगित रहेगी जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह से बंद नहीं कर देता। हाल ही में जनवरी 2026 में भारत द्वारा चिनाब नदी पर दुलहस्ती स्टेज-II जैसी परियोजनाओं को तेजी से मंजूरी देना यह संकेत देता है कि नई दिल्ली अब अपनी जल संपदा के रणनीतिक उपयोग को लेकर पीछे हटने वाली नहीं है।

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