Manikarnika Ghat: जानें सदियों पुराने जीर्णोद्धार की गाथा

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वाराणसी: बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के बाद अब वाराणसी का ऐतिहासिक मणिकर्णिका घाट एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। ‘महाश्मशान’ के रूप में विख्यात इस घाट को व्यवस्थित करने की कवायद जहाँ एक ओर आधुनिक बदलावों की ओर इशारा कर रही है, वहीं दूसरी ओर इसके प्राचीन स्वरूप और परंपराओं को लेकर समाज का एक वर्ग चिंतित है। मणिकर्णिका का इतिहास केवल वर्तमान विवादों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें सदियों पुराने पौराणिक आख्यानों और गौरवशाली निर्माणों में गहराई से धंसी हुई हैं।

पौराणिक महिमा: भगवान विष्णु की तपस्थली

महाश्मशान का इतिहास पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा है। स्कंद पुराण के काशी खंड और मत्स्य पुराण में मणिकर्णिका को पांच पवित्र जल-स्थलों में से एक बताया गया है।

  • विष्णु कुंड: पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने यहाँ एक कुंड का निर्माण किया था।

  • तपस्या का प्रमाण: माना जाता है कि भगवान विष्णु ने यहाँ शिव को प्रसन्न करने के लिए पांच लाख वर्षों तक तपस्या की थी।

  • चरणपादुका: घाट क्षेत्र में स्थित विष्णु चरणपादुका मंदिर आज भी उस समन्वय का प्रतीक है, जहाँ संगमरमर पर भगवान विष्णु के चरणचिह्न अंकित हैं।

ऐतिहासिक प्रमाण और आक्रांताओं का प्रतिरोध

मणिकर्णिका घाट का उल्लेख केवल ग्रंथों में ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अभिलेखों में भी मिलता है:

  • गुप्त काल: पांचवीं शताब्दी के गुप्तकालीन अभिलेखों में इस घाट का स्पष्ट जिक्र है।

  • सीढ़ियों का निर्माण: घाट की पत्थर की सीढ़ियां 1303 ईस्वी में बनाई गई थीं।

  • 1664 का संघर्ष: इतिहासकार यदुनाथ सरकार और जेम्स जी. लोचटेफेल्ड के अनुसार, 1664 ईस्वी में औरंगजेब की सेना के हमले के दौरान नागा संन्यासियों ने डटकर मुकाबला किया और मुगल सैनिकों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था।

जीर्णोद्धार का कालक्रम: शासकों और दानदाताओं की भूमिका

समय-समय पर विभिन्न शासकों ने मणिकर्णिका घाट के संरक्षण और पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है:

काल/वर्ष शासक/दानदाता मुख्य कार्य
1730 ईस्वी बाजीराव पेशवा घाट और सीढ़ियों का पुनर्निर्माण कराया।
1791 ईस्वी महारानी अहिल्याबाई होल्कर घाट का व्यापक जीर्णोद्धार और नया स्वरूप प्रदान किया।
1795 ईस्वी अहिल्याबाई होल्कर तारकेश्वर मंदिर का निर्माण, जहाँ शिव ‘तारक मंत्र’ देते हैं।
1830 ईस्वी रानी बैजाबाई (ग्वालियर) घाट की मरम्मत और आंशिक पुनर्निर्माण।
1895 ईस्वी महाराजा मंगल सिंह (अलवर) प्रसिद्ध मनोकामेश्वर मंदिर का निर्माण कराया।
1965 ईस्वी उत्तर प्रदेश सरकार घाट की मरम्मत कराई, जो वर्तमान स्वरूप का आधार बना।

तारकेश्वर मंदिर: मोक्ष की अंतिम सीढ़ी

अहिल्याबाई होल्कर द्वारा निर्मित तारकेश्वर मंदिर मणिकर्णिका की आत्मा माना जाता है। इस आयताकार पंचायतन शैली के मंदिर में चार मुखों वाला शिवलिंग है। धार्मिक मान्यता है कि यहाँ स्वयं भगवान शिव मृत आत्मा के कानों में तारक मंत्र का उपदेश देकर उसे मोक्ष प्रदान करते हैं। आज भी दाह संस्कार के बाद तारकेश्वर की पूजा करने की अटूट परंपरा चली आ रही है।

मणिकर्णिका घाट का इतिहास गवाह है कि यह कभी स्थिर नहीं रहा और समय के साथ इसमें बदलाव होते रहे हैं। वर्तमान में चल रहा नवीनीकरण का कार्य इसी कड़ी का हिस्सा है, लेकिन चुनौती आस्था और आधुनिकता के बीच उचित संतुलन साधने की है।