तेहरान की सड़कों पर गूंजा ‘पहलवी वापस आओ’, क्या खत्म होगा मौलवियों का राज?
नई दिल्ली/तेहरान | ईरान में अयातुल्ला अली खामेनेई के नेतृत्व वाली धार्मिक सरकार के खिलाफ जनविद्रोह की ज्वाला धधक उठी है। बढ़ती महंगाई और आर्थिक बदहाली से शुरू हुआ गुस्सा अब एक पूर्ण राजनीतिक आंदोलन में बदल गया है। शुक्रवार को राजधानी तेहरान समेत देश के तमाम हिस्सों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए, जो पिछले दो दशकों का सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन माना जा रहा है। सरकार द्वारा इंटरनेट और अंतरराष्ट्रीय टेलीफोन सेवाओं पर पाबंदी लगाने के बावजूद, प्रदर्शनकारियों के हौसले पस्त नहीं हुए हैं।
‘पहलवी वापस आएंगे’ : नारों से दहला तेहरान
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में प्रदर्शनकारी ‘तानाशाह मुर्दाबाद’ और ‘इस्लामिक गणराज्य मुर्दाबाद’ के नारे लगाते नजर आ रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि भीड़ अब खुलकर निर्वासित क्राउन प्रिंस रजा पहलवी के समर्थन में नारेबाजी कर रही है। लोग चिल्ला रहे हैं— “यह आखिरी लड़ाई है, पहलवी वापस आएंगे।” जानकारों का कहना है कि किसी समय शाह का समर्थन करना ईरान में मौत की सजा का कारण बन सकता था, लेकिन आज की पीढ़ी का यह खुला समर्थन धार्मिक सत्ता के प्रति चरम असंतोष को दर्शाता है।
पेरिस जैसा ग्लैमर और लोहे जैसा शासन : पहलवी का इतिहास
1925 से 1979 के बीच ईरान पर शासन करने वाला पहलवी राजवंश आज फिर चर्चा के केंद्र में है। इतिहासकारों के अनुसार, रजा शाह और उनके बेटे मोहम्मद रजा पहलवी के दौर में ईरान का तेजी से आधुनिकीकरण हुआ था।
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मिडिल ईस्ट का पेरिस: उस समय तेहरान इतना आधुनिक था कि इसे ‘मिडिल ईस्ट का पेरिस’ कहा जाता था। महिलाएं हिजाब के बजाय स्कर्ट पहनती थीं और पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव था।
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सफेद क्रांति: 1960 के दशक में शाह ने जमीन सुधार, महिलाओं को वोट का अधिकार और औद्योगीकरण जैसे बड़े बदलाव किए, जिससे एक नया मिडिल क्लास पैदा हुआ।
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दमन और भ्रष्टाचार: हालांकि, इस चमक-धमक के पीछे शाह की गुप्त पुलिस ‘SAVAK’ का खौफ और भ्रष्टाचार भी था, जिसके कारण 1979 में अयातुल्ला खुमैनी के नेतृत्व वाली इस्लामी क्रांति ने राजशाही को उखाड़ फेंका।
तख्तापलट और विदेशी दखल की दास्तां
पहलवी राजवंश का इतिहास युद्ध और कूटनीति से भरा रहा है।
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1921 का उदय: एक सैन्य अधिकारी रजा खान ने ब्रिटिश मदद से तख्तापलट कर इस वंश की नींव रखी थी।
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ऑपरेशन एजैक्स (1953): जब लोकप्रिय प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग ने तेल का राष्ट्रीयकरण किया, तो अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने तख्तापलट कर शाह को पूर्ण नियंत्रण दिलाया। यही वह समय था जब शाह ‘अमेरिका के आदमी’ के रूप में पहचाने जाने लगे।
1979 से 2026: इतिहास का चक्र
जनवरी 1979 में शाह देश छोड़कर भाग गए थे और खुमैनी के लौटने के साथ ईरान एक इस्लामिक गणराज्य बना। लेकिन आज, 47 साल बाद, वही इतिहास खुद को दोहराता दिख रहा है। अमेरिका में रह रहे रजा पहलवी ने ईरानियों से एकजुट होने का आह्वान किया है। बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और तानाशाही ने लोगों को एक बार फिर उस दौर की याद दिला दी है जिसे कभी खुमैनी ने ‘पश्चिमी बुराई’ कहा था।
