अमेरिका की नई ‘टैरिफ वॉर’: रूस से तेल खरीदा तो लगेगा 500% जुर्माना

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Sanctioning Russia

वाशिंगटन/नई दिल्ली: दुनिया एक नए और भीषण आर्थिक युद्ध की दहलीज पर खड़ी है। अमेरिका ने रूस को आर्थिक रूप से पंगु बनाने के लिए अब तक का सबसे कड़ा कानून ‘Sanctioning Russia Act of 2025’ लाने की तैयारी कर ली है। इस कानून के तहत रूस से तेल या यूरेनियम खरीदने वाले देशों पर 500% तक का भारी-भरकम टैरिफ लगाया जा सकता है। अमेरिका का यह सीधा संदेश है— “या तो रूस से व्यापार छोड़ो, या अमेरिकी बाजार से हाथ धो लो।”

भारत और चीन पर सबसे ज्यादा असर

भारत और चीन वर्तमान में रूसी तेल के सबसे बड़े खरीदार हैं। अमेरिका की इस ‘टैरिफ दादागिरी’ का सीधा असर भारत पर पड़ सकता है। जहाँ भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस से सस्ता तेल चाहता है, वहीं अमेरिका इसे यूक्रेन युद्ध की फंडिंग रोकने के हथियार के रूप में देख रहा है।

विशेषज्ञ की राय: विदेश मामलों के विशेषज्ञ रोबिंदर सचदेव के अनुसार, “अगर अमेरिका टैरिफ बढ़ाता है, तो भारत को रूस से तेल की खरीद कम करनी ही होगी। रूस से आयात पहले ही जून 2025 के 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन से घटकर जनवरी 2026 में 1.2 मिलियन बैरल पर आ गया है। भारत को अब यूरोप और ग्लोबल साउथ जैसे नए बाजारों की तलाश तेज करनी होगी।”

वैश्विक टकराव के 8 मुख्य केंद्र: एक नजर में

देश टकराव की मुख्य वजह वर्तमान स्थिति
भारत रूस से तेल खरीद और रणनीतिक स्वायत्तता दोस्ती के बावजूद टैरिफ का दबाव।
चीन टेक्नोलॉजी, AI, चिप्स और ताइवान वर्चस्व की जंग; अमेरिका को पीछे छोड़ने की होड़।
ईरान परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल तकनीक कड़े आर्थिक प्रतिबंध और सत्ता परिवर्तन की कोशिश।
रूस यूक्रेन युद्ध और नाटो का विस्तार आमने-सामने का टकराव; परमाणु युद्ध का खतरा।
यूक्रेन यूरेनियम, टाइटेनियम और सैन्य मदद अमेरिका की नजर यूक्रेन के खनिज खजानों पर।
वियतनाम दक्षिण चीन सागर और सैन्य गुटबाजी अमेरिका साथ चाहता है, वियतनाम तटस्थ रहना चाहता है।
तुर्की रूसी S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम नाटो सहयोगी होने के बावजूद रिश्तों में खटास।
वेनेजुएला तेल संसाधन और राजनीतिक नियंत्रण 3 जनवरी 2026 को राष्ट्रपति मादुरो की गिरफ्तारी।

2027: महायुद्ध की आहट?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल आर्थिक पाबंदी नहीं, बल्कि एक बड़े युद्ध की तैयारी है। रोबिंदर सचदेव ने चेतावनी दी है कि 2027 तक युद्ध जैसी प्रबल संभावनाएं हैं। चीन अपनी सेना को अपग्रेड कर रहा है और राष्ट्रपति शी जिनपिंग ताइवान मुद्दे को हल करने के लिए आक्रामक रुख अपना सकते हैं। अमेरिका भी अपनी सैन्य शक्ति को फिर से संगठित कर रहा है ताकि वह चीन से पिछड़ न जाए।

आखिर अमेरिका क्यों डरा हुआ है?

अमेरिका की इस छटपटाहट के पीछे चार मुख्य डर हैं:

  1. डॉलर का गिरता साम्राज्य: रूस, चीन और अब भारत भी अपनी मुद्राओं में व्यापार कर रहे हैं, जिससे डॉलर का एकाधिकार खतरे में है।

  2. तकनीकी पिछड़ापन: AI और चिप्स के मामले में चीन अमेरिका को कड़ी टक्कर दे रहा है।

  3. ऊर्जा पर नियंत्रण: रूस और ईरान मिलकर एक नया एनर्जी ब्लॉक बना रहे हैं।

  4. मल्टी-पोलर वर्ल्ड: दुनिया अब ‘वन पावर’ (अमेरिका) से ‘मल्टी पावर’ की ओर बढ़ रही है।

‘ग्लोबल साउथ’ का उदय

अमेरिका के इस भारी दबाव के खिलाफ अब BRICS और ग्लोबल साउथ के देश एकजुट हो रहे हैं। भारत इस नई विश्व व्यवस्था की आवाज बनकर उभरा है। ईरान, यूएई और इथियोपिया जैसे देशों के जुड़ने से एक ऐसा वित्तीय तंत्र तैयार किया जा रहा है जो अमेरिकी प्रतिबंधों और डॉलर की मनमानी से मुक्त हो सके।

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