नल से ‘अमृत’: इंदौर की घटना के बाद चर्चा में ओडिशा का ‘पुरी मॉडल’

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Drink From Tap

नई दिल्ली/इंदौर: 21वीं सदी के डिजिटल भारत में आज भी दूषित पानी से मौत की खबरें आना एक कड़वी हकीकत है। हाल ही में देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से हुई मौतों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जहाँ एक तरफ स्वच्छता के कीर्तिमान रचे जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ साफ पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए लोग तरस रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में ही एक ऐसा शहर भी है, जहाँ आपको RO या किसी भी वॉटर फिल्टर की जरूरत नहीं है?

पुरी (ओडिशा): भारत का पहला ‘Drink From Tap’ शहर

ओडिशा का जगन्नाथ पुरी न केवल अपनी धार्मिक महत्ता के लिए जाना जाता है, बल्कि अब यह ‘ड्रिंक-फ्रॉम-टैप’ (DFT) सुविधा देने वाला भारत का पहला शहर बन चुका है। यहाँ का नल का पानी सीधे पीने योग्य है, जो भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के कड़े मानकों को पूरा करता है।

इंदौर की त्रासदी और पानी का सवाल

इंदौर के भागीरथपुरा में हाल ही में दूषित पानी से करीब 11 लोगों की जान जाने की खबर आई (हालाँकि आधिकारिक आंकड़ा 4 बताया गया)। यह घटना बताती है कि पुराने पाइपलाइन सिस्टम और जल प्रबंधन में चूक कितनी जानलेवा हो सकती है। इंदौर जैसे विकसित शहर में ऐसी स्थिति के बीच ‘पुरी मॉडल’ एक उम्मीद की किरण बनकर उभरा है।

कैसे काम करता है पुरी का ‘सुजल’ मिशन?

ओडिशा सरकार ने ‘सुजल योजना’ के तहत पुरी को पूरी तरह बदल दिया है। इसकी सफलता के पीछे ये मुख्य कारण हैं:

  1. अत्याधुनिक तकनीक: पानी को शुद्ध करने के लिए क्लोरीनीकरण और ओजोनीकरण (Ozonation) जैसी तकनीकों का इस्तेमाल होता है।

  2. फूड-ग्रेड पाइपलाइन: पुराने और जंग लगे पाइपों को हटाकर फूड-ग्रेड पाइपलाइन डाली गई हैं, जिससे बाहरी गंदगी अंदर नहीं जा पाती।

  3. हाई-प्रेशर सप्लाई: नलों में 24 घंटे हाई-प्रेशर बना रहता है, जिससे लीकेज होने पर भी गंदा पानी अंदर नहीं घुस सकता।

  4. रियल-टाइम मॉनिटरिंग: पानी की गुणवत्ता जांचने के लिए पाइपलाइनों में सेंसर लगे हैं। अगर शुद्धता में थोड़ी भी कमी आती है, तो सिस्टम तुरंत अलर्ट भेजता है।

इस मॉडल से क्या-क्या फायदे हुए?

  • पर्यावरण की सुरक्षा: प्लास्टिक की बोतलों और RO से निकलने वाले बर्बाद पानी (West Water) में भारी कमी आई है।

  • आर्थिक बचत: गरीब परिवारों को अब महंगे वाटर फिल्टर खरीदने या बिजली खर्च करने की जरूरत नहीं है। सालाना हजारों रुपयों की बचत हो रही है।

  • बेहतर स्वास्थ्य: जल जनित बीमारियों (E. coli, टाइफाइड) पर लगाम लगी है।

क्या पूरे भारत में संभव है यह मॉडल?

पुरी की सफलता के बाद अब भुवनेश्वर और कटक में भी इसे लागू किया जा रहा है। 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, कई अन्य शहर भी इस ओर कदम बढ़ा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके लिए केवल तकनीक नहीं, बल्कि दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासन की पारदर्शिता की जरूरत है।

न्यूजहॉक (Newshawk) की विशेष रिपोर्ट: इंदौर जैसी घटनाएं हमें आगाह करती हैं कि ‘स्मार्ट सिटी’ का मतलब केवल चौड़ी सड़कें नहीं, बल्कि ‘सुरक्षित पानी’ भी होना चाहिए। पुरी ने साबित कर दिया है कि अगर प्रशासन चाहे, तो नल से ‘अमृत’ पहुंचाना नामुमकिन नहीं है।

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