ब्रिक्स देशों के ‘गोल्डन वार’ से अमेरिका की बादशाहत को बड़ी चुनौती

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नई दिल्ली/बीजिंग/मॉस्को | विशेष संवाददाता। दशकों से अपनी करेंसी डॉलर के दम पर दुनिया भर में आर्थिक ‘दादागिरी’ दिखाने वाले अमेरिका का घमंड अब चूर होता नज़र आ रहा है। भारत, रूस और चीन के एक रणनीतिक कदम ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में डॉलर के दबदबे को सीधी चुनौती दी है। ब्रिक्स (BRICS) देशों का सोने (Gold) की ओर बढ़ता झुकाव डॉलर की साख के लिए बड़ा खतरा बन गया है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, दुनिया की करेंसी पावर अब डॉलर से शिफ्ट होकर सोने पर टिकती दिख रही है।

रिकॉर्ड स्तर पर गोल्ड रिजर्व: दुनिया का आधा सोना ब्रिक्स के पास

साल 2025 में भारत, रूस और चीन जैसे देशों ने अपने गोल्ड रिजर्व को रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचा दिया है। ग्लोबल सेंट्रल बैंक के पास कुल 35,000 से 36,000 टन सोना है, जिसमें से अकेले ब्रिक्स देशों के पास 17,500 टन से ज्यादा सोना जमा हो चुका है। यानी दुनिया का लगभग आधा स्वर्ण भंडार अब इस समूह के पास है।

स्वर्ण भंडार की वर्तमान स्थिति: | देश | स्वर्ण भंडार (टन में) | | :— | :— | | अमेरिका | 8,133 | | रूस | 2,332 | | चीन | 2,279 | | भारत | 880 |

स्त्रोत: 2024-25 के नवीनतम आंकड़े

क्यों हो रहा है डॉलर से मोहभंग?

ब्रिक्स देशों की सोने पर बढ़ती निर्भरता के पीछे अमेरिका की अपनी नीतियां जिम्मेदार मानी जा रही हैं।

  • प्रतिबंधों का डर: यूक्रेन युद्ध के बाद रूस के विदेशी मुद्रा भंडार को जिस तरह फ्रीज किया गया, उसने दुनिया को यह संदेश दिया कि डॉलर आधारित संपत्तियां राजनीतिक जोखिम के दायरे में हैं।

  • न्यूट्रल एसेट: सोना एक ‘न्यूट्रल एसेट’ है जिसे कोई भी देश न तो फ्रीज कर सकता है और न ही अपनी मनमर्जी से कंट्रोल कर सकता है।

  • ब्रिक्स का विस्तार: अब ब्रिक्स में सिर्फ पाँच देश नहीं, बल्कि ईरान, मिस्र, इथियोपिया और यूएई जैसे देश भी शामिल हैं, जो या तो सोना पैदा कर रहे हैं या भारी मात्रा में खरीद रहे हैं।

डॉलर की ‘उल्टी गिनती’ शुरू

ब्रिक्स देश वैश्विक व्यापार का करीब 30 फीसदी हिस्सा कंट्रोल करते हैं। अब ये देश अपने व्यापार का एक-तिहाई हिस्सा स्थानीय मुद्राओं में कर रहे हैं। सोने की आक्रामक खरीदारी के जरिए ये देश डॉलर पर अपनी निर्भरता को न्यूनतम कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि लॉन्ग टर्म में डॉलर की डिमांड कम होने से उसकी वैल्यू घटेगी। ग्लोबल इकोनॉमिक सिस्टम अब ‘मल्टीपोलर’ (बहुध्रुवीय) बनने की दिशा में है, जहाँ सोना एक ‘न्यू एंकर’ की तरह उभर रहा है। भले ही फिलहाल डॉलर मजबूत दिख रहा हो, लेकिन सोने के सहारे तैयार किया गया यह नया रोडमैप अमेरिका की वित्तीय बादशाहत के अंत की शुरुआत माना जा रहा है।

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