राजस्थान के स्कूलों में पढ़ाई जाएगी साहिबजादों की वीरता: मुख्यमंत्री
जयपुर: राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने वीर बाल दिवस 2025 के पावन अवसर पर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक ऐतिहासिक घोषणा की है। राज्य सरकार ने निर्णय लिया है कि अब राजस्थान के स्कूली पाठ्यक्रम में सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी के साहिबजादों—बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह—की शौर्य गाथा को शामिल किया जाएगा।
मुख्यमंत्री की इस घोषणा के बाद से ही प्रशासनिक और शैक्षिक गलियारों में इसकी चर्चा तेज हो गई है। सरकार का मानना है कि इस कदम से आने वाली पीढ़ी को साहस, बलिदान और धर्म की रक्षा के मूल्यों की प्रेरणा मिलेगी।
पाठ्यक्रम में क्यों शामिल हुई यह वीर गाथा?
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि नई पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास और पूर्वजों के बलिदान के बारे में जानना अत्यंत आवश्यक है।
“साहिबजादों की प्रेरक कहानियाँ अब छोटे बच्चों की पाठ्य पुस्तकों का हिस्सा होंगी। इससे छात्र यह सीख सकेंगे कि कैसे कम उम्र में भी विपरीत परिस्थितियों का निडर होकर सामना किया जाता है और अपनी संस्कृति व धर्म की रक्षा के लिए अडिग रहा जाता है।” — भजनलाल शर्मा, मुख्यमंत्री (राजस्थान)
इतिहास के पन्नों में अमर बलिदान: कौन थे बाबा फतेह सिंह और जोरावर सिंह?
सिख इतिहास में इन दो नन्हे वीरों का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। गुरु गोबिंद सिंह जी और माता जीतो जी के ये सबसे छोटे पुत्र वीरता की मिसाल माने जाते हैं:
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अदम्य साहस: 9 वर्ष के जोरावर सिंह और 6 वर्ष के फतेह सिंह ने मुगल शासकों की क्रूरता के सामने सिर नहीं झुकाया।
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शहादत का कारण: 26 दिसंबर, 1705 को मुगलों ने उन्हें बंदी बना लिया था। सरहिंद के नवाब वज़ीर खान ने उन पर इस्लाम कबूल करने के लिए भारी दबाव डाला, लेकिन उन्होंने अपने धर्म और सच्चाई के मार्ग को छोड़ने से साफ इनकार कर दिया।
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दीवार में चुनवाया गया: उनकी इसी दृढ़ता के कारण मुगल सेनापति ने उन्हें जीवित ही दीवार में चुनवा देने की क्रूर सजा दी।
‘वीर बाल दिवस’ का महत्व
केंद्र सरकार ने साहिबजादों की शहादत को सम्मान देने के लिए 26 दिसंबर को ‘वीर बाल दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की थी। अब राजस्थान सरकार के इस फैसले से प्रदेश के लाखों बच्चे इन नन्हे सेनानियों के बलिदान को करीब से जान सकेंगे।
