गिनी-बिसाऊ में सैन्य तख्तापलट: राष्ट्रपति गिरफ्तार, सेना ने सत्ता पर पूरा नियंत्रण किया घोषित

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Guinea-Bissau

नई दिल्ली। पश्चिम अफ्रीका का छोटा लेकिन संवेदनशील देश गिनी-बिसाऊ एक बार फिर सैन्य तख्तापलट की चपेट में आ गया है। रविवार को हुए राष्ट्रपति चुनावों के नतीजे आने से पहले ही देश में अफरा-तफरी मच गई और बुधवार दोपहर सेना ने संसद सहित कई महत्वपूर्ण सरकारी संस्थानों पर धावा बोल दिया। इसके बाद सेना ने राष्ट्रपति उमरो सिसोको एम्बालो को गिरफ्तार कर लिया और अपने आपको सत्ता का “पूर्ण नियंत्रक” घोषित कर दिया।

फायरिंग, कर्फ्यू और बंद सीमाएं: पूरे देश में दहशत

राजधानी बिसाऊ में बुधवार दोपहर अचानक गोलियों की तड़तड़ाहट गूँज उठी। फायरिंग राष्ट्रपति भवन, गृह मंत्रालय और चुनाव आयोग कार्यालय के पास भी सुनाई दी। कुछ ही देर बाद टीवी स्क्रीन पर सेना के अधिकारियों का एक समूह दिखाई दिया जिसने तीन बड़े ऐलान किए— चुनावी प्रक्रिया को अगले आदेश तक निलंबित किया जाता है। देश की सभी सीमाएं—जमीन, हवा और समुद्र—तुरंत बंद। पूरे देश में रात का कर्फ्यू लागू। यह स्पष्ट संकेत था कि सेना ने औपचारिक रूप से सत्ता हथिया ली है।

राष्ट्रपति और विपक्ष के नेता दोनों गिरफ्तार

अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार सेना ने न सिर्फ राष्ट्रपति एम्बालो को, बल्कि मुख्य विपक्षी नेता डोमिंगोस सिमोएस पेरेइरा को भी गिरफ्तार कर लिया है। इंटरनेट सेवाओं को बाधित करने की भी कोशिश की गई, ताकि खबरें बाहर न जा सकें। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि तख्तापलट की अगुवाई कर रहा अधिकारी डेनिस एन’काना, राष्ट्रपति का ही सुरक्षा प्रमुख था। यानी राष्ट्रपति को उसी ने गिरफ्तार किया जिसे उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी।

देश की डेमोग्राफी और अस्थिर राजनीति

गिनी-बिसाऊ एक धार्मिक और जातीय रूप से मिश्रित देश है: 45–50% मुस्लिम, 20–22% क्रिश्चियन, 30% पारंपरिक अफ्रीकी धर्म मानने वाले, 1974 में पुर्तगाल से स्वतंत्रता के बाद से देश में लगभग लगातार राजनीतिक अस्थिरता रही है। पिछले 50 सालों में यहां कई तख्तापलट हो चुके हैं।

चुनाव से पहले ही भड़का विवाद—दोनों उम्मीदवारों ने खुद को विजेता बताया

रविवार को हुए राष्ट्रपति चुनावों के नतीजे गुरुवार को आना थे, लेकिन उससे पहले ही हालात बिगड़ गए। मौजूदा राष्ट्रपति एम्बालो और उनके प्रतिद्वंद्वी फर्नांडो डायस दोनों ने बिना किसी आधिकारिक पुष्टि के खुद को विजेता घोषित कर दिया था। सोशल मीडिया पर इसका असर दिखा और तनाव तेजी से बढ़ने लगा। चुनाव प्रक्रिया में पहले से ही विवाद था, क्योंकि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी PAIGC को उम्मीदवार खड़ा करने की अनुमति ही नहीं दी गई थी।

क्यों हुआ तख्तापलट?

विशेषज्ञों के अनुसार, सत्ता संघर्ष की वजहें साफ हैं चुनाव पारदर्शी नहीं थे, दोनों उम्मीदवारों ने जीत का दावा किया, विपक्ष पहले से नाराज था, संवैधानिक संकट की स्थिति बन गई, सेना ने खुद को “स्थिरता बहाल करने वाला” बताकर सत्ता पर कब्जा कर लिया, यह स्थिति वैसी ही है जैसी 2019 के चुनाव में बनी थी, जब दोनों उम्मीदवारों ने खुद को विजेता बताया और 4 महीने तक देश राजनीतिक संकट में डूबा रहा।

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