पाकिस्तान: बलूचिस्तान में महिला सुसाइड बॉम्बर्स का बढ़ता ग्राफ
इस्लामाबाद/क्वेटा: पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत लंबे समय से अशांति की चपेट में है, लेकिन हाल के वर्षों में यहाँ उग्रवाद का एक नया और खतरनाक चेहरा सामने आया है— ‘महिला आत्मघाती हमलावर’। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) की मजीद ब्रिगेड द्वारा महिलाओं का इस्तेमाल आत्मघाती हमलों के लिए किया जाना पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
शिक्षित महिलाएं क्यों चुन रही हैं मौत का रास्ता?
इस ट्रेंड की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ये महिलाएं अनपढ़ या मजबूर नहीं, बल्कि अक्सर उच्च शिक्षित और मध्यम वर्गीय परिवारों से ताल्लुक रखती हैं।
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शारी बलोच का उदाहरण: कराची यूनिवर्सिटी में हुए हमले ने पूरी दुनिया को तब चौंका दिया था जब दो बच्चों की मां और एम.फिल डिग्री धारक शारी बलोच ने खुद को बम से उड़ा लिया था।
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हालिया रिपोर्टों के अनुसार, बीएलए अब ऐसी महिलाओं को भर्ती कर रहा है जो वैचारिक रूप से पूरी तरह समर्पित हैं।
प्रमुख कारण: क्यों बढ़ रहा है आक्रोश?
विशेषज्ञों और रिपोर्टों के अनुसार, इस घातक बदलाव के पीछे कई गहरे सामाजिक और राजनीतिक कारण हैं:
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जबरन गायब किए जाने (Enforced Disappearances): बलूचिस्तान में हजारों पुरुषों के लापता होने और सुरक्षा बलों द्वारा उन्हें उठाए जाने के आरोपों ने बलूच महिलाओं के भीतर गहरे आक्रोश को जन्म दिया है। जब उनके भाई, पति या पिता वर्षों तक वापस नहीं आते, तो वे प्रतिरोध के इस हिंसक रास्ते को चुनती हैं।
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राज्य के प्रति अविश्वास: पाकिस्तानी सेना और सरकार द्वारा बलूचिस्तान के संसाधनों का दोहन और वहां के लोगों के साथ हो रहे कथित अन्याय ने अलगाववाद की भावना को मजबूत किया है।
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मजीद ब्रिगेड की रणनीति: बीएलए की मजीद ब्रिगेड ने महिलाओं को ‘प्रतीकात्मक प्रतिरोध’ के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया है, क्योंकि महिलाओं पर सुरक्षा एजेंसियों को संदेह कम होता है, जिससे वे आसानी से हाई-सिक्योरिटी वाले ठिकानों तक पहुँच जाती हैं।
CPEC और चीनी प्रोजेक्ट्स पर मंडराता खतरा
इन महिला हमलावरों का प्राथमिक लक्ष्य अक्सर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) और वहां काम कर रहे चीनी नागरिक होते हैं। बीएलए का मानना है कि चीन, पाकिस्तान के साथ मिलकर बलूचिस्तान के संसाधनों की लूट कर रहा है। इन हमलों का सीधा असर पाकिस्तान के विदेशी निवेश और अंतरराष्ट्रीय छवि पर पड़ रहा है।
सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती
महिला हमलावरों के बढ़ने से पाकिस्तानी सेना और पुलिस के लिए सुरक्षा प्रोटोकॉल बदलना मुश्किल हो गया है। सांस्कृतिक संवेदनशीलता के कारण महिलाओं की सघन तलाशी लेना चुनौतीपूर्ण होता है, जिसका फायदा उग्रवादी संगठन उठा रहे हैं।
