सीबीआई का सफर: भरोसे की कसौटी पर ‘पिंजरे के तोते’ का दंश
नई दिल्ली | देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी, केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI), आज एक बार फिर अपनी कार्यशैली और साख को लेकर चर्चा में है। अंकिता भंडारी केस से लेकर बिहार की नीट छात्रा की संदिग्ध मौत तक, जब राज्य की एजेंसियां विफल नजर आती हैं, तो आम आदमी की जुबान पर एक ही नाम आता है— CBI।
पूर्व निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला ने एक बार कहा था, “अन्य एजेंसियों से असंतुष्ट लोगों की पहली पसंद आज भी सीबीआई है।” यह वाक्य आज भी एजेंसी की प्रासंगिकता को बयां करता है।
जोगिंदर सिंह: जब ‘टाइगर’ ने हिला दी थी सत्ता की चूलें
सीबीआई के इतिहास में 31 जुलाई 1996 से 30 जून 1997 तक का दौर स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। यह वह समय था जब जोगिंदर सिंह ने निदेशक के रूप में बागडोर संभाली। उनके कार्यकाल में ही बहुचर्चित ‘चारा घोटाला’ परवान चढ़ा।
जोगिंदर सिंह की निर्भीकता का आलम यह था कि उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल के दबाव के आगे झुकने से इनकार कर दिया। उन्हीं की जांच का नतीजा था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को इस्तीफा देकर जेल जाना पड़ा। हालांकि, सत्ता की आंखों की किरकिरी बनने के कारण उनका कार्यकाल आगे नहीं बढ़ सका, लेकिन उन्होंने सीबीआई को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
विवादों का साया: ‘पिंजरे का तोता’ और आंतरिक कलह
एजेंसी का सफर हमेशा गौरवमयी नहीं रहा। यूपीए-2 के दौरान कोयला घोटाले की जांच में हस्तक्षेप को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को ‘पिंजरे में बंद तोता’ तक कह दिया था।
हाल के वर्षों में आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच की ‘गंगवार’ ने एजेंसी की साख को भारी ठेस पहुंचाई। चंदा कोचर मामले में एक अधिकारी के अचानक तबादले ने भी सीबीआई की कार्यशैली पर सवालिया निशान खड़े किए थे।
बड़े मामले: जिन पर रही देश की नजर
1963 में गठन के बाद से सीबीआई ने देश के सबसे बड़े घोटालों की गुत्थी सुलझाई है:
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आर्थिक अपराध: विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चौकसी जैसे भगोड़ों के मामले।
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घोटाले: बोफोर्स, 2G स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ गेम्स, कोयला ब्लॉक आवंटन और वीवीआईपी हेलीकॉप्टर मामला।
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भ्रष्टाचार: शारदा चिटफंड, रोज वैली और नारदा स्टिंग ऑपरेशन।
वर्तमान दौर: पर्दे के पीछे से ‘साइलेंट’ सुधार
बीते कुछ सालों में सीबीआई ने विवादों से दूरी बनाई है। पूर्व निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और सुबोध कुमार जायसवाल के बाद अब मौजूदा निदेशक प्रवीण सूद उसी ‘साइलेंट पुलिसिंग’ की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। आज की सीबीआई विवादों में रहने के बजाय तकनीकी सुधारों और कानूनी मजबूती पर अधिक ध्यान दे रही है।
डी.पी. कोहली से शुरू हुआ यह सफर आज प्रवीण सूद तक पहुंच चुका है। तमाम उतार-चढ़ावों और राजनीतिक दबावों के बावजूद, भारतीय न्याय व्यवस्था में सीबीआई आज भी वह अंतिम उम्मीद है, जहां से न्याय की किरण दिखाई देती है।
CBI के मुख्य स्तंभ (निदेशकों का सफर)
| दौर | प्रमुख चेहरा | विशेष उपलब्धि/घटना |
| आरंभिक | डी.पी. कोहली | संस्था की स्थापना और बुनियादी ढांचा। |
| ऐतिहासिक | जोगिंदर सिंह | चारा घोटाले में लालू यादव पर कार्रवाई। |
| सुधारवादी | ऋषि कुमार शुक्ला | एजेंसी के भीतर पारदर्शिता और तकनीक। |
| वर्तमान | प्रवीण सूद | तकनीकी जांच और साख की बहाली। |
