संसद में ‘शून्य’ होने की कगार पर मायावती की बसपा

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1989 के बाद पहली बार दोनों सदनों में नहीं होगा BSP का कोई सदस्य; यूपी विधानसभा और विधान परिषद में भी अस्तित्व संकट में

नई दिल्ली/लखनऊ। कभी उत्तर प्रदेश की सत्ता संभालने वाली और देश की राजनीति में ‘तीसरी बड़ी शक्ति’ मानी जाने वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। राजनीतिक समीकरणों के अनुसार, नवंबर 2026 के बाद भारतीय संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में बसपा का कोई भी प्रतिनिधि नहीं बचेगा। 1984 में गठन और 1989 में पहली चुनावी सफलता के बाद यह इतिहास में पहली बार होगा जब संसद में बसपा का आंकड़ा ‘शून्य’ हो जाएगा।

रामजी गौतम के रिटायर होते ही खत्म होगी मौजूदगी

वर्तमान में राज्यसभा में रामजी गौतम बसपा के इकलौते सांसद हैं। उनका छह साल का कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को समाप्त हो रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का खाता नहीं खुल सका था, ऐसे में राज्यसभा से गौतम के हटने के बाद संसद के दोनों सदनों में बसपा का प्रतिनिधित्व पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।

राज्यसभा की डगर हुई मुश्किल

उत्तर प्रदेश से राज्यसभा की 10 सीटों पर 2026 में चुनाव होने हैं। नियम के मुताबिक, यूपी से एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए कम से कम 37 विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है। वर्तमान में 402 सदस्यीय विधानसभा में बसपा के पास केवल एक विधायक है। इस भारी संख्यात्मक कमी के कारण बसपा के लिए दोबारा किसी सदस्य को राज्यसभा भेजना नामुमकिन नजर आ रहा है। 2026 में रिटायर होने वाले अन्य सांसदों में भाजपा के 8 और सपा के 1 सदस्य (रामगोपाल यादव) शामिल हैं।

चारों तरफ सिमटता जनाधार

बसपा की स्थिति केवल संसद में ही नहीं, बल्कि राज्य में भी नाजुक बनी हुई है:

  • लोकसभा: 2024 चुनाव में शून्य सीटें।

  • विधान परिषद: इस साल भीमराव अंबेडकर का कार्यकाल खत्म होने के बाद अब वहां भी बसपा का कोई सदस्य नहीं है।

  • विधानसभा: यूपी की 403 सीटों में से केवल एक विधायक।

1984 से 2026: एक चक्र का अंत?

कांशीराम द्वारा 1984 में गठित इस पार्टी ने 1989 में पहली बड़ी सफलता चखी थी, जब बिजनौर से मायावती, आजमगढ़ से रामकिशन यादव और पंजाब के फिल्लौर से हरभजन लाखा जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। तब से लेकर अब तक संसद में बसपा की आवाज हमेशा गूंजती रही है। मायावती खुद चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रही हैं, लेकिन अब पार्टी का अस्तित्व बचाने की बड़ी चुनौती उनके सामने है।

2027 के चुनाव पर टिकी उम्मीदें

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब बसपा के पास वापसी के लिए केवल 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव ही एकमात्र जरिया बचा है। यदि 2027 के चुनावों में पार्टी दमदार प्रदर्शन नहीं करती है, तो संसद में इसकी वापसी का इंतजार 2029 (अगले लोकसभा चुनाव) तक या उससे भी आगे बढ़ सकता है।

मुख्य आंकड़े:

  • 37: राज्यसभा की एक सीट के लिए जरूरी विधायकों की संख्या।

  • 01: वर्तमान में बसपा के पास यूपी में कुल विधायकों की संख्या।

  • 00: लोकसभा और यूपी विधान परिषद में बसपा के सदस्यों की संख्या।

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