ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को NGT की हरी झंडी, हिंद महासागर में बढ़ेगी भारत की ताकत
नई दिल्ली | नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी 90,000 करोड़ रुपये की ग्रेट निकोबार मेगा इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजना को ‘रणनीतिक रूप से अनिवार्य’ बताते हुए अपनी अंतिम मंजूरी दे दी है। सोमवार को आए इस फैसले के साथ ही एनजीटी ने प्रोजेक्ट को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास के बीच संतुलन बनाने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय (Safeguards) अपनाए गए हैं।
क्यों अहम है यह फैसला?
जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि इस प्रोजेक्ट को रोकने का कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है। एनजीटी ने पर्यावरण मंत्रालय द्वारा 2022 में दी गई मंजूरी को बरकरार रखा। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने सरकार को कड़ी हिदायत दी है कि प्रोजेक्ट के दौरान निर्धारित शर्तों और पर्यावरणीय नियमों का सख्ती से पालन किया जाए।
दुनिया के 40% तेल व्यापार पर रहेगी नजर
ग्रेट निकोबार द्वीप की भौगोलिक स्थिति इसे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक बनाती है।
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मलक्का की खाड़ी से नजदीकी: यह प्रोजेक्ट दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग ‘मलक्का जलडमरूमध्य’ से महज 160 किलोमीटर दूर है।
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तेल टैंकरों की निगरानी: दुनिया का लगभग 40% तेल व्यापार इसी क्षेत्र से गुजरता है। इस प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद भारत इस पूरे इलाके में जहाजों की आवाजाही पर प्रभावी नजर रख सकेगा।
क्या है 90,000 करोड़ का मास्टर प्लान?
इस मेगा प्रोजेक्ट के तहत चार मुख्य स्तंभों पर काम किया जाएगा:
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इंटरनेशनल कंटेनर टर्मिनल: एक विशाल बंदरगाह जो वैश्विक व्यापार का केंद्र बनेगा।
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रणनीतिक एयरपोर्ट: नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए एक आधुनिक हवाई अड्डा।
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एकीकृत शहर: 166 वर्ग किलोमीटर में फैला एक आधुनिक टाउनशिप।
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पावर प्लांट: शहर और पोर्ट की जरूरतों के लिए एक समर्पित बिजली संयंत्र।
चीन को कड़ा जवाब और ‘एक्ट ईस्ट’ नीति
विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रोजेक्ट चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (भारत को घेरने की रणनीति) का एक प्रभावी जवाब है। यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की नौसैनिक क्षमता और समुद्री सुरक्षा को अभूतपूर्व मजबूती प्रदान करेगा। साथ ही, यह प्रधानमंत्री के ‘सागरमाला विजन’ और ‘एक्ट ईस्ट’ पॉलिसी को नई गति देगा।
पर्यावरण और जनजातियों का संरक्षण
प्रोजेक्ट को लेकर पर्यावरणविदों ने ‘शोंपेन’ और ‘निकोबारी’ जैसी विलुप्तप्राय जनजातियों और लेदरबैक कछुओं के संरक्षण पर चिंता जताई थी। एनजीटी ने स्पष्ट किया कि 2023 में एक उच्च स्तरीय समिति ने इन सभी चिंताओं की समीक्षा की है और प्रोजेक्ट को इन वर्गों के हितों को ध्यान में रखकर ही आगे बढ़ाया जा रहा है।
