बजट का इतिहास: चमड़े के ब्रीफकेस से डिजिटल टैबलेट तक का सफर
नई दिल्ली। भारत का केंद्रीय बजट केवल देश की अर्थव्यवस्था का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह अपने साथ 160 से भी अधिक वर्षों का एक समृद्ध और दिलचस्प इतिहास समेटे हुए है। ब्रिटिश काल से लेकर आज के ‘डिजिटल इंडिया’ तक, बजट पेश करने के तरीकों और परंपराओं में कई क्रांतिकारी बदलाव आए हैं।
92 साल पुरानी ‘शाम 5 बजे’ की परंपरा का अंत
आजादी के बाद कई दशकों तक भारत का बजट शाम 5 बजे पेश किया जाता था। यह परंपरा ब्रिटिश शासन की देन थी, ताकि लंदन के समय (दोपहर 11:30 बजे) के अनुसार वहां के अधिकारी इसे सुन सकें। साल 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने इस औपनिवेशिक परंपरा को तोड़ते हुए पहली बार सुबह 11 बजे बजट पेश किया। तब से बजट सुबह ही पेश किया जाता है।
तारीख में बदलाव: फरवरी के अंत से 1 फरवरी तक
एक और बड़ा बदलाव साल 2017 में हुआ। इससे पहले बजट फरवरी के आखिरी कार्य दिवस (28 या 29 फरवरी) को पेश किया जाता था। पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसे बदलकर 1 फरवरी कर दिया। इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि 1 अप्रैल से शुरू होने वाले नए वित्त वर्ष से पहले बजट की पूरी प्रक्रिया और फंड आवंटन का काम पूरा हो सके।
जब प्रधानमंत्रियों ने खुद संभाली कमान
आमतौर पर बजट वित्त मंत्री पेश करते हैं, लेकिन भारतीय इतिहास में तीन ऐसे मौके आए जब देश के प्रधानमंत्री ने बजट पेश किया:
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जवाहरलाल नेहरू: बजट पेश करने वाले पहले प्रधानमंत्री (1958-59)।
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इंदिरा गांधी: बजट पेश करने वाली पहली महिला और दूसरी प्रधानमंत्री (1970-71)।
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राजीव गांधी: प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए बजट पेश करने वाले तीसरे व्यक्ति (1987-88)।
हिंदी में बजट की शुरुआत और रेल बजट का विलय
शुरुआत में बजट केवल अंग्रेजी में छपता था। साल 1955-56 से इसे हिंदी में भी तैयार किया जाने लगा। वहीं, 2017 में एक और ऐतिहासिक फैसला लेते हुए 92 साल से अलग पेश हो रहे ‘रेल बजट’ को ‘आम बजट’ के साथ मिला दिया गया।
ब्रीफकेस से ‘बही-खाता’ और अब ‘डिजिटल टैबलेट’
दशकों तक बजट को चमड़े के ब्रीफकेस में लाने की परंपरा रही। 2019 में निर्मला सीतारमण ने इसे लाल कपड़े में लिपटे ‘बही-खाते’ का रूप दिया। साल 2021 में डिजिटल इंडिया को बढ़ावा देते हुए इतिहास में पहली बार ‘पेपरलेस बजट’ पेश किया गया, जिसे वित्त मंत्री ने टैबलेट के जरिए पढ़ा।
