यूजीसी बिल 2026 पर बवाल: सवर्ण समाज क्यों कर रहा है कड़ा विरोध?
नई दिल्ली: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए नए नियमों को लेकर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सहित देश के कई राज्यों में विवाद गहरा गया है। ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम- 2026’ के खिलाफ सवर्ण समाज लामबंद हो गया है। विरोध इतना बढ़ गया है कि चर्चा है कि सरकार इस कानून को वापस लेने पर भी विचार कर सकती है।
क्या है पूरा मामला? (5 मुख्य बिंदु)
1. ओबीसी को भेदभाव की परिभाषा में शामिल करना: यूजीसी के नए रेगुलेशन (जो 15 जनवरी 2026 से प्रभावी हुए हैं) में पहली बार ओबीसी (OBC) वर्ग को भी जातीय भेदभाव की परिभाषा के दायरे में लाया गया है। पहले केवल एससी (SC) और एसटी (ST) वर्ग के पास ही भेदभाव की शिकायत के विशेष अधिकार थे। अब ओबीसी छात्र, शिक्षक और कर्मचारी भी उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करा सकेंगे।
2. नए ‘समानता प्रकोष्ठ’ (Equality Cell) का गठन: हर यूनिवर्सिटी और कॉलेज में अब ‘समान अवसर प्रकोष्ठ’ का गठन अनिवार्य होगा। इसमें एससी, एसटी, ओबीसी, महिला और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधि सदस्य होंगे। यह समिति हर छह महीने में अपनी रिपोर्ट यूजीसी को भेजेगी, जिसके आधार पर संस्थान की रैंकिंग और स्थिति मापी जाएगी।
3. सवर्ण समाज का विरोध क्यों? सवर्ण समाज के प्रतिनिधियों का तर्क है कि इस कानून का बड़े स्तर पर दुरुपयोग हो सकता है। उनका कहना है कि सवर्ण वर्ग के पास अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिए कोई मंच नहीं है। उन्हें डर है कि इस नई व्यवस्था से सवर्णों को अलग-थलग करने की साजिश रची जा रही है और शैक्षणिक माहौल खराब हो सकता है।
4. राजनीतिक दबाव और प्रदर्शन: गाजियाबाद के डासना मंदिर के पीठाधीश्वर यति नरसिंहानंद गिरी सहित कई संगठनों ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने सवाल उठाया है कि ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ और भूमिहार जैसे सवर्ण समाज के हितों की बात कौन करेगा? दिल्ली बॉर्डर पर भारी विरोध प्रदर्शनों ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है।
5. क्या वापस होगा कानून? उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए सरकार किसी भी बड़े वर्ग को नाराज नहीं करना चाहती। चर्चा है कि भारी विरोध को देखते हुए यूजीसी इस कानून के कड़े प्रावधानों को वापस ले सकता है या इसमें संशोधन कर सकता है।
भाजपा के कई वरिष्ठ नेता भी फिलहाल इस संवेदनशील मुद्दे पर खुलकर बोलने से बच रहे हैं। पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने भी कहा है कि वे अभी इस कानून का अध्ययन कर रहे हैं और सोच-समझकर ही बयान देंगे।
