पॉक्सो एक्ट में ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज पर विचार करे केंद्र: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने किशोरों के बीच बढ़ते सहमति से बने संबंधों और पॉक्सो (POCSO) कानून के दुरुपयोग को देखते हुए केंद्र सरकार को एक बड़ा सुझाव दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि सरकार कानून में ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज लाने पर विचार करे। इसका उद्देश्य उन किशोरों को कानूनी कार्यवाही से बचाना है जो आपसी सहमति से संबंध बनाते हैं और जिनके बीच उम्र का फासला बहुत कम होता है।
क्यों पड़ी इस क्लॉज की जरूरत?
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने 9 जनवरी को दिए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि वर्तमान में 18 साल से कम उम्र में मर्जी से बनाया गया संबंध भी कानूनी तौर पर अपराध की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने माना कि इस कानून का कई बार निजी रंजिशें निपटाने के लिए गलत इस्तेमाल किया जा रहा है।
अदालत ने कहा कि ऐसे किशोरों को कठोर दंडात्मक शिकंजे से मुक्त करने की आवश्यकता है जहाँ कोई शोषण नहीं हुआ है, बल्कि किशोर उम्र की सहज भावनाएँ और सहमति शामिल है। इस संबंध में कोर्ट ने फैसले की प्रति भारत सरकार के लॉ सेक्रेटरी को भेजी है ताकि वे इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिए जरूरी कदम उठा सकें।
उम्र के निर्धारण पर सख्त रुख
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस निर्देश को भी स्पष्ट किया जिसमें मेडिकल टेस्ट (बोन एज टेस्ट) को प्राथमिकता दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उम्र का निर्धारण एक अनिवार्य प्रक्रिया है और इसका क्रम इस प्रकार होना चाहिए:
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प्रथम वरीयता: मैट्रिकुलेशन (10वीं) या उसके समकक्ष प्रमाण पत्र।
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द्वितीय वरीयता: नगर निकाय या पंचायत द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र।
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अंतिम विकल्प: जब कोई दस्तावेज उपलब्ध न हो, तभी बोन एज टेस्ट (मेडिकल टेस्ट) कराया जाना चाहिए।
दुरुपयोग रोकने के लिए तंत्र बनाने का निर्देश
अदालत ने केंद्र से उन व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए भी एक तंत्र (Mechanism) बनाने को कहा है, जो इस सख्त कानून का उपयोग निजी बदला लेने के लिए करते हैं। पॉक्सो के तहत दोषी पाए जाने पर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है, इसलिए इसका सावधानीपूर्वक इस्तेमाल अनिवार्य है।
पॉक्सो एक्ट और प्रस्तावित बदलाव: एक नजर में
| विषय | वर्तमान स्थिति | सुप्रीम कोर्ट का सुझाव |
| सहमति की आयु | 18 वर्ष से कम हर संबंध ‘अपराध’ है। | ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज से किशोरों को छूट मिले। |
| उम्र का निर्धारण | कई बार सीधे मेडिकल टेस्ट कराया जाता है। | पहले स्कूल सर्टिफिकेट और जन्म प्रमाण पत्र को आधार मानें। |
| कानून का दुरुपयोग | निजी रंजिश में इस्तेमाल की खबरें। | दुरुपयोग करने वालों के खिलाफ कार्रवाई का तंत्र बने। |
| अदालत की टिप्पणी | कानून का बेजा इस्तेमाल चिंताजनक। | लॉ सेक्रेटरी आवश्यक कानूनी सुधारों पर विचार करें। |
क्या है ‘रोमियो-जूलियट’ कानून?
यह शब्द अक्सर उन कानूनी प्रावधानों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो कम उम्र के ऐसे किशोरों को राहत देते हैं जिनके बीच उम्र का अंतर कम (जैसे 2-3 साल) होता है और जहाँ संबंध पूरी तरह सहमति से बने हों। कई पश्चिमी देशों में इस तरह के प्रावधान पहले से मौजूद हैं।
