देश भर में गिग वर्कर्स की हड़ताल, डिलीवरी ऐप्स और वर्कर्स के बीच छिड़ी जंग
नई दिल्ली | नए साल के जश्न के बीच आज देश भर में ऑनलाइन फूड और ग्रोसरी डिलीवरी सेवाओं में बड़ी बाधा आ सकती है। तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन (TGPWU) के आह्वान पर हजारों गिग वर्कर्स आज 31 दिसंबर को हड़ताल पर हैं। इस हड़ताल का सीधा असर जोमैटो, स्विगी, ब्लिंकिट और जेप्टो जैसी कंपनियों की डिलीवरी सेवाओं पर पड़ने की आशंका है, क्योंकि न्यू ईयर ईव पर आम दिनों के मुकाबले ऑर्डर की संख्या कई गुना बढ़ जाती है।
क्यों हो रही है हड़ताल?
यूनियन प्रमुख शेख सलाउद्दीन के नेतृत्व में वर्कर्स अपनी गिरती कमाई और सुरक्षा को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इससे पहले 25 दिसंबर को भी एक सांकेतिक हड़ताल की गई थी। वर्कर्स की मुख्य शिकायतें और मांगें निम्नलिखित हैं:
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पेआउट में भारी कटौती: पहले प्रति ऑर्डर ₹80 या ₹60 मिलते थे, जो अब घटकर ₹10 से ₹20 तक रह गए हैं। यूनियन की मांग है कि इसे कम से कम ₹35-40 किया जाए।
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10-मिनट डिलीवरी का विरोध: वर्कर्स का कहना है कि 10 मिनट में डिलीवरी का दबाव सड़क दुर्घटनाओं के खतरे को बढ़ाता है।
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एल्गोरिदम और आईडी ब्लॉकिंग: ऐप के जरिए वर्कर्स की आईडी को बिना ठोस कारण के ब्लॉक करना बंद करने और पारदर्शी व्यवस्था की मांग की गई है।
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सोशल सिक्योरिटी: करोड़ों गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा और कंपनियों की ओर से सही बीमा लाभ देने की अपील की गई है।
गिग इकॉनमी और वर्कर्स की कड़वी सच्चाई
नीति आयोग और ‘पैगाम’ (PAIGAM) के सर्वे के आंकड़े इस सेक्टर की गंभीर स्थिति को दर्शाते हैं:
| विवरण | सांख्यिकी/तथ्य |
| वर्कर्स की संख्या (2030 अनुमान) | 2.35 करोड़ |
| दैनिक कमाई | 43% वर्कर्स खर्च काटकर ₹500 से कम कमाते हैं |
| साप्ताहिक छुट्टी | 40.7% वर्कर्स हफ्ते में एक भी दिन छुट्टी नहीं लेते |
| बुनियादी खर्च | 72% वर्कर्स अपनी कमाई से घर का खर्च पूरा नहीं कर पा रहे |
| प्लेटफॉर्म फीस | राइड वैल्यू का 30-40% हिस्सा कंपनियां काट लेती हैं |
कंपनियों की जवाबी रणनीति
हड़ताल को विफल करने के लिए कंपनियों ने ‘इंसेंटिव’ का सहारा लिया है। जोमैटो ने वर्कर्स को आश्वासन दिया है कि प्रशासन उनकी सुरक्षा करेगा और वे ₹3000 तक कमा सकते हैं। वहीं, कुछ वर्कर्स ने बताया कि आज के दिन विशेष इंसेंटिव दिए जा रहे हैं—जैसे 15 डिलीवरी पर सामान्य दिनों से ₹150 ज्यादा। यूनियन का आरोप है कि कंपनियां एक्स्ट्रा इंसेंटिव और बंद पड़ी आईडी को खोलकर हड़ताल तोड़ने की कोशिश कर रही हैं।
क्या कहते हैं वर्कर्स?
एक डिलीवरी पार्टनर ‘कृष्णा’ (जेप्टो) ने बताया कि उन्हें सिर्फ स्टोर से ग्राहक तक जाने के ₹14 प्रति किलोमीटर मिलते हैं, वापसी का कोई भुगतान नहीं होता। वहीं ‘मिस्टर एक्स’ (ब्लिंकिट) का कहना है कि अगर सामान कम निकले या देरी हो, तो उसका नुकसान वर्कर्स को अपनी जेब से भरना पड़ता है।
निष्कर्ष: भारत में 2019 से 2022 के बीच गिग इकॉनमी में युवाओं की भागीदारी 8 गुना बढ़ी है। ऐसे में यह हड़ताल न केवल नए साल के जश्न को प्रभावित कर रही है, बल्कि भारत के तेजी से बढ़ते गिग सेक्टर के भविष्य और मज़दूर अधिकारों पर भी बड़े सवाल खड़े कर रही है।
