यूनुस की एक ‘गलती’ और सुलग उठा बांग्लादेश

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Mohammad Yunus

ढाका/नई दिल्ली: पड़ोसी देश बांग्लादेश आज हिंसा, अराजकता और कट्टरपंथ की भयावह आग में झुलस रहा है। विशेषज्ञों और जानकारों का मानना है कि बांग्लादेश की इस दुर्दशा की जड़ में अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस का एक विवादास्पद फैसला है। जिस फैसले को यूनुस ने ‘लोकतांत्रिक’ बताकर पेश किया था, वही आज देश के अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं के लिए अभिशाप साबित हो रहा है।

कट्टरपंथ को मिली ‘ऑक्सीजन’

शेख हसीना के सत्ता छोड़ने के बाद 8 अगस्त 2024 को मोहम्मद यूनुस ने कार्यभार संभालते ही सबसे विवादित कदम उठाया— जमात-ए-इस्लामी पर लगा प्रतिबंध हटाना। उल्लेखनीय है कि शेख हसीना सरकार ने 1 अगस्त 2024 को आतंकवाद विरोधी कानून के तहत इस संगठन और इसके छात्र विंग ‘इस्लामी छात्र शिबिर’ पर बैन लगाया था। यूनुस के इस फैसले ने एक ऐसे कट्टरपंथी संगठन को खुली छूट दे दी जो बांग्लादेश को शरिया कानून वाला राष्ट्र बनाने की वकालत करता है।

हिंदुओं पर हमलों की बाढ़

बैन हटने के बाद से ही बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ हिंसा का नंगा नाच शुरू हो गया। रिपोर्टों के अनुसार:

  • हिंसा के आंकड़े: 4 से 20 अगस्त 2024 के बीच हिंदुओं पर 2,010 हमले हुए।

  • नुकसान: 157 घर-दुकानें जलाई गईं और 152 मंदिरों को निशाना बनाया गया।

  • मॉब लिंचिंग: दीपू दास, सम्राट और उस्मान हादी जैसे युवाओं की बेरहमी से हत्या कर दी गई। जमात-ए-इस्लामी की विचारधारा से प्रभावित भीड़ अब खुलेआम अल्पसंख्यक बस्तियों को निशाना बना रही है, जिससे वहां डर और असुरक्षा का माहौल व्याप्त है।

जमात-ए-इस्लामी: एक खूनी इतिहास

जमात-ए-इस्लामी का इतिहास भारत विरोध और पाकिस्तान परस्ती से भरा रहा है।

  1. 1971 का विश्वासघात: इस संगठन ने 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना का साथ दिया और लाखों निर्दोष बांग्लादेशियों के नरसंहार में शामिल रहा।

  2. संविधान विरोधी: 2013 में बांग्लादेश की अदालत ने इसे चुनाव लड़ने से रोक दिया था क्योंकि इसके नियम देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान के खिलाफ थे।

  3. मंदिरों पर हमला: 2013 में भी युद्ध अपराधों के फैसले के बाद इस संगठन ने 50 से अधिक मंदिर तोड़े थे।

यूनुस सरकार का तर्क बनाम हकीकत

मुहम्मद यूनुस की सरकार ने दावा किया कि जमात आतंकी गतिविधियों में शामिल नहीं है और पिछला बैन राजनीतिक प्रतिशोध था। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। जमात अब ढाका की सड़कों पर बड़ी रैलियां कर रहा है और कट्टरवाद को बढ़ावा दे रहा है। इसे अब चुनाव लड़ने का भी अधिकार मिल गया है, जो बांग्लादेश की लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष छवि के लिए बड़ा खतरा माना जा रहा है।

निष्कर्ष: खतरे में बांग्लादेश का भविष्य

मुहम्मद यूनुस के इस एक फैसले ने दशकों से दबे कट्टरपंथ को फिर से जिंदा कर दिया है। जिस संगठन को शेख हसीना ने देश की सुरक्षा के लिए प्रतिबंधित किया था, उसे मिली ‘खुली छूट’ ने न केवल हिंदुओं के लिए काल का काम किया है, बल्कि पूरे बांग्लादेश की शांति और अर्थव्यवस्था को भी पटरी से उतार दिया है।

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