भारत की जनगणना होगी 100% डिजिटल, 1931 के बाद पहली बार जुटेंगे सभी जातियों के आंकड़े

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Ashwini Vaishnaw copy

नई दिल्ली: भारत के जनसांख्यिकीय इतिहास में एक बड़ा अध्याय जुड़ने जा रहा है। देश की आगामी जनगणना 2027 में पहली बार पूरी तरह से डिजिटल रूप में आयोजित की जाएगी। केंद्र सरकार ने डेटा की सुरक्षा, सटीकता, तेजी और पारदर्शिता को प्राथमिकता देते हुए पुरानी कागज-आधारित व्यवस्था को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर स्थानांतरित करने का निर्णय लिया है।

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने घोषणा की कि इस विशाल डिजिटल अभियान के लिए 11,718 करोड़ रुपये का बजट मंजूर किया गया है।

दो चरणों में पूरा होगा महाअभियान। यह डिजिटल जनगणना दो मुख्य चरणों में संपन्न होगी:

  1. पहला चरण (हाउस लिस्टिंग और हाउसिंग जनगणना): यह प्रक्रिया अप्रैल 2026 से सितंबर 2026 के बीच चलेगी।

  2. दूसरा चरण (जनसंख्या गणना): मुख्य गणना फरवरी 2027 में की जाएगी।

क्या खास होगा इस बार की प्रक्रिया में? डिजिटल जनगणना में तकनीक का भरपूर इस्तेमाल होगा।

  • जियो-टैगिंग और बहुभाषी ऐप: देश की हर इमारत को जियो-टैग किया जाएगा। जनगणना के लिए इस्तेमाल होने वाला मोबाइल ऐप हिंदी और अंग्रेजी सहित 16 से अधिक भाषाओं में उपलब्ध होगा।

  • विस्तृत प्रश्नावली: इस बार प्रवास (माइग्रेशन) से जुड़े गहरे सवाल पूछे जाएंगे—जैसे जन्मस्थान, पिछला निवास, वर्तमान स्थान पर रहने की अवधि और स्थान बदलने का कारण।

  • सबसे बड़ा बदलाव (जातिगत आंकड़े): एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए, 1931 के बाद पहली बार केवल SC/ST ही नहीं, बल्कि सभी समुदायों की जाति से जुड़े आंकड़े जुटाए जाएंगे।

डिजिटल होने के बड़े फायदे: सालों का काम महीनों में

  • तेजी और सटीकता: पहले पेपर फॉर्म के कारण रिपोर्ट आने में कई साल लग जाते थे। अब डेटा रियल-टाइम में अपलोड होगा। अनुमान है कि शुरुआती आंकड़े गणना के 10 दिनों के भीतर और अंतिम विस्तृत रिपोर्ट 6 से 9 महीनों में मिल जाएगी।

  • भविष्य की योजनाएं: इन सटीक आंकड़ों का उपयोग 2029 में लोकसभा सीटों के नए परिसीमन (delimitation), फंड वितरण और सरकारी योजनाओं को बेहतर बनाने में किया जाएगा। ऑटो-चेक और जियो-टैगिंग से गलतियों और छूटे हुए घरों की संभावना कम होगी।

  • लागत और रोजगार: सरकार को टैबलेट खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि कर्मचारी अपने स्मार्टफोन का उपयोग करेंगे, जिससे खर्च बचेगा। इस प्रक्रिया से लगभग 2.4 करोड़ व्यक्ति-दिवस का अस्थायी रोजगार भी सृजित होगा।

राह में चुनौतियां भी कम नहीं। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में पूर्ण डिजिटलीकरण की अपनी चुनौतियां हैं:

  • डिजिटल विभाजन (Digital Divide): देश की लगभग 65% आबादी ही ऑनलाइन है। पहाड़ी, जंगली और दूर-दराज के इलाकों में कमजोर नेटवर्क के कारण गरीब और पिछड़े लोगों की गिनती छूटने का जोखिम है। (हालांकि, नेटवर्क समस्या वाले क्षेत्रों में बैकअप के तौर पर पेपर फॉर्म का विकल्प रखा गया है।)

  • डिजिटल साक्षरता: जनगणना कार्य में लगने वाले लगभग 30 लाख कर्मचारियों (जिनमें अधिकतर शिक्षक होंगे) को ऐप चलाने की प्रभावी ट्रेनिंग देना एक बड़ी चुनौती होगी। इसके अलावा, ग्रामीण बुजुर्गों और प्रवासी मजदूरों में ऐप के प्रति हिचकिचाहट हो सकती है।

  • डेटा सुरक्षा की चिंता: चूंकि जाति और प्रवास जैसी संवेदनशील जानकारी मोबाइल नेटवर्क के जरिए भेजी जाएगी, इसलिए साइबर सुरक्षा और डेटा की गोपनीयता (Privacy) सुनिश्चित करना सरकार के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी होगी।

  • पहली जनगणना: भारत में जनगणना की शुरुआत 1872 में हुई थी, लेकिन यह पूरे देश में एक साथ नहीं हुई थी। पहली विधिवत और एक साथ (synchronous) जनगणना 1881 में शुरू हुई। तब से यह हर 10 साल में होती आ रही है।

  • स्वतंत्रता के बाद: 1947 में आजादी मिलने के बाद, पहली जनगणना 1951 में हुई थी। स्वतंत्रता के बाद से अब तक कुल 7 बार जनगणना हो चुकी है (1951, 1961, 1971, 1981, 1991, 2001, और 2011)।

  • अंतिम जनगणना: आखिरी बार जनगणना 2011 में पूरी हुई थी, जो कि कुल मिलाकर 15वीं जनगणना थी।

 

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