बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष: 45 साल के नितिन नबीन के पास कमान
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने अपने संगठनात्मक ढांचे में एक बड़ा बदलाव करते हुए 45 वर्षीय नितिन नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी सौंपी है। नितिन नबीन का जन्म बीजेपी की स्थापना के महज़ दो महीने बाद 23 मई 1980 को हुआ था। उनकी इस नियुक्ति ने पार्टी के भीतर उम्र और अनुभव के पुराने समीकरणों को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।
अटल-आडवाणी के दौर की वापसी?
नितिन नबीन की कम उम्र को लेकर हो रही चर्चा बीजेपी के लिए नई नहीं है:
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अटल बिहारी वाजपेयी: 1968 में जब वे भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष बने, तब उनकी उम्र 44 साल थी।
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लालकृष्ण आडवाणी: 1973 में महज़ 46 साल की उम्र में जनसंघ के अध्यक्ष बने थे।
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बीजेपी की स्थापना: 6 अप्रैल 1980 को बीजेपी बनी और अटल बिहारी वाजपेयी इसके पहले अध्यक्ष बने।
एक मज़बूत बीजेपी और सत्ता का केंद्र
नितिन नबीन ऐसे समय में अध्यक्ष बने हैं जब बीजेपी अपने ऐतिहासिक शिखर पर है:
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लोकसभा में पार्टी के पास 240 सीटें हैं।
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राज्यसभा में 99 सांसद हैं।
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देश के 21 राज्यों में बीजेपी या एनडीए की सरकारें हैं।
हालांकि, जानकारों का मानना है कि सत्ता में होने पर अध्यक्ष की भूमिका सीमित हो जाती है। पूर्व पत्रकार नीना व्यास के अनुसार, 2014 के बाद ही नहीं, बल्कि अटल-आडवाणी के दौर में भी महत्वपूर्ण फैसले पीएमओ (PMO) से ही होते थे। वरिष्ठ पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय का तर्क है कि नितिन नबीन का चयन इसलिए हुआ क्योंकि वे प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के वफ़ादार हैं।
नितिन नबीन के सामने 5 बड़ी चुनौतियां
राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नितिन नबीन का सफर आसान नहीं होने वाला है। उनके सामने संगठनात्मक और राजनीतिक मोर्चे पर कई जटिलताएं हैं:
1. आगामी चुनाव और परिसीमन (2026-2029)
नबीन को जल्द ही पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, पुदुचेरी और केरल के विधानसभा चुनावों का सामना करना होगा। इसके अलावा, 2029 के लोकसभा चुनाव सबसे बड़ी चुनौती होंगे, क्योंकि वे परिसीमन और 33% महिला आरक्षण के लागू होने के बीच होंगे। सरकार 1 मार्च 2027 की स्थिति के आधार पर जनगणना कराने की तैयारी में है, जिसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया शुरू होगी।
2. मोदी के बाद नेतृत्व का सवाल
2029 तक प्रधानमंत्री मोदी की उम्र करीब 80 वर्ष हो जाएगी। पार्टी के सामने ‘मोदी के बाद कौन’ का सवाल खड़ा होगा। अमित शाह और योगी आदित्यनाथ के बीच संभावित कशमकश और उनके बीच सर्वसम्मति बनाना नबीन के लिए एक बड़ी परीक्षा होगी।
3. संगठन और क्षेत्रीय विस्तार
शक्ति के केंद्रीकरण के कारण संगठन को आलाकमान के निर्देशों और अनुशासन के बीच संतुलित रखना नबीन की ज़िम्मेदारी होगी। विशेष रूप से दक्षिण भारत में पार्टी की मशीनरी को दुरुस्त करना उनके लिए बड़ी बाधा है।
4. बदलती वैश्विक परिस्थितियां और अर्थव्यवस्था
डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद भारत पर 50% टैरिफ और ईरान व्यापार पर अतिरिक्त 25% टैरिफ जैसे आर्थिक दबाव बढ़ रहे हैं। चीन के साथ संबंधों को सामान्य करना और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (CPC) के साथ फिर से शुरू हुए संवाद को संभालना भी उनके एजेंडे में होगा।
5. वैचारिक और सांस्कृतिक विविधता
उत्तर और पश्चिम भारत में मज़बूत पकड़ रखने वाली बीजेपी के लिए दक्षिण और पूर्वी भारत की भाषायी और सांस्कृतिक बहुलता को जोड़ना हमेशा से कठिन रहा है। क्षेत्रीय और जाति आधारित मज़बूत पार्टियों से निपटना भी एक स्थायी चुनौती बनी हुई है।
नितिन नबीन की पृष्ठभूमि आरएसएस (RSS) की नहीं रही है और उन्होंने सेंट माइकल हाई स्कूल, पटना जैसे संस्थानों से शिक्षा प्राप्त की है। हालांकि, छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव (2023) में सह-प्रभारी के तौर पर मिली जीत ने उनके संगठनात्मक कौशल को साबित किया है। अब देखना यह होगा कि वे मोदी-शाह के मार्गदर्शन में पार्टी को किस दिशा में ले जाते हैं।
