माघ मेले में ‘शंकराचार्य’ प्रोटोकॉल पर घमासान: कौन हैं चार शंकराचार्य
प्रयागराज: संगम नगरी में आयोजित माघ मेले के दौरान ‘मौनी अमावस्या’ के शाही स्नान पर ज्योतिर्मठ के स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को प्रशासन द्वारा स्नान से रोके जाने के बाद बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। 18 जनवरी को हुई इस घटना के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थकों और पुलिस के बीच तीखी झड़प हुई, जिसमें समर्थकों पर लाठीचार्ज के आरोप लगे हैं। इसके विरोध में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने अनुयायियों के साथ संगम क्षेत्र में धरने पर बैठ गए।
प्रशासन का तर्क: प्रोटोकॉल देने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं
प्रयागराज के प्रशासनिक अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के आदेशों के तहत स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य का प्रोटोकॉल देने का कोई कानूनी प्रावधान मौजूद नहीं है। अधिकारियों के अनुसार, ज्योतिर्मठ के पूर्व शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने उन्हें आधिकारिक रूप से अपना उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं किया था। स्वामी स्वरूपानंद के निधन के बाद अविमुक्तेश्वरानंद ने स्वयं को शंकराचार्य घोषित किया था, जो वर्तमान में कानूनी विवाद का विषय है।
देश के चार प्रमुख मठ और उनके नेतृत्व की स्थिति
आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख पीठों की वर्तमान स्थिति और उनके शंकराचार्य इस प्रकार हैं:
| मठ का नाम | स्थान | वर्तमान शंकराचार्य | प्रमुख तथ्य |
| ज्योतिर्मठ | चमोली, उत्तराखंड | स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (विवादित) | इनके पद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है और अन्य मठ इन्हें मान्यता नहीं देते। |
| शारदा मठ | द्वारका, गुजरात | स्वामी सदानंद सरस्वती | यह पश्चिम दिशा का प्रमुख केंद्र है और विद्या की देवी सरस्वती को समर्पित है। |
| गोवर्धन मठ | पुरी, ओडिशा | स्वामी निश्चलानंद सरस्वती | यह पूर्व दिशा में स्थित है और अद्वैत वेदांत का प्रमुख प्रचारक है। |
| श्रृंगेरी मठ | चिक्कमगलुरु, कर्नाटक | स्वामी भारती तीर्थ | तुंगा नदी के किनारे स्थित इस पीठ को ‘श्रृंगेरी शारदा पीठम’ भी कहा जाता है। |
महाकुंभ 2025 और आपसी समन्वय
इस विवाद के बीच महाकुंभ 2025 की एक घटना भी चर्चा में है, जहाँ द्वारका पीठ के स्वामी सदानंद सरस्वती और श्रृंगेरी मठ के स्वामी विधुशेखर भारती ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ मिलकर संगम में स्नान किया था। हालांकि, पुरी पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती मेले में उपस्थित तो थे, लेकिन उन्होंने अन्य शंकराचार्यों के साथ सामूहिक स्नान में भाग नहीं लिया था।
यह विवाद एक बार फिर सनातन धर्म के सर्वोच्च पदों के चयन और उनके प्रशासनिक प्रोटोकॉल की जटिलताओं को रेखांकित करता है।
