हम बहुमत से महज 6 कदम दूर, मुंबई की राजनीति में कुछ भी हो सकता है: संजय राउत

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नई दिल्ली/मुंबई: देश की सबसे अमीर नगर पालिका, बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) के चुनावी नतीजे आने के बाद अब ‘मेयर’ की कुर्सी को लेकर सस्पेंस गहरा गया है। 227 सीटों वाली बीएमसी में 89 सीटों के साथ बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। महायुति गठबंधन (बीजेपी + शिंदे सेना) ने बहुमत का आंकड़ा तो पार कर लिया है, लेकिन उद्धव ठाकरे गुट (UBT) के एक दावे ने मुंबई की सियासत में हलचल मचा दी है।

बीएमसी का सियासी गणित: किसके पास कितनी ताकत?

मेयर की कुर्सी तक पहुँचने के लिए जादुई आंकड़ा 114 है। वर्तमान नतीजों के अनुसार सीटों का बंटवारा कुछ इस प्रकार है:

पार्टी / गठबंधन प्राप्त सीटें
बीजेपी (BJP) 89
शिवसेना (एकनाथ शिंदे) 29
महायुति (कुल) 118
शिवसेना (UBT) 65
कांग्रेस + VBA 24
AIMIM 8
MNS (UBT के साथ गठबंधन) 6
NCP (अजित पवार) 3
सपा (SP) 2
NCP (शरद पवार) 1

संजय राउत का बड़ा दावा: “खेल अभी बाकी है”

भले ही आंकड़ों में महायुति (118) बहुमत के पार दिख रही हो, लेकिन शिवसेना (UBT) के सांसद संजय राउत ने बड़ा दांव चल दिया है। राउत का कहना है कि विपक्षी गठबंधन (MVA व अन्य) के पास वर्तमान में 108 सीटें हैं।

“हम बहुमत से महज 6 कदम दूर हैं। मुंबई की राजनीति में कुछ भी हो सकता है। 6 पार्षदों का समर्थन मिलते ही खेल पलट जाएगा।” — संजय राउत

क्या विपक्षी गठबंधन जुटा पाएगा 6 वोट?

उद्धव सेना की रणनीति छोटी पार्टियों और निर्दलीयों को अपने पाले में लाने की है। वर्तमान में विपक्षी खेमे में UBT (65), कांग्रेस-VBA (24), AIMIM (8), MNS (6), सपा (2) और शरद पवार गुट (1) को मिलाकर करीब 106-108 की संख्या बन रही है। ऐसे में अजित पवार की 3 सीटें और अन्य निर्दलीयों की भूमिका निर्णायक हो सकती है।

दिलचस्प बात यह है कि अजित पवार महायुति गठबंधन का हिस्सा हैं, लेकिन उन्होंने बीएमसी चुनाव अलग लड़ने का फैसला किया था। यदि वे अपनी 3 सीटों के साथ पाला बदलते हैं या अन्य निर्दलीय पार्षद विपक्ष के साथ जाते हैं, तो महायुति की राह मुश्किल हो सकती है।

फिलहाल 118 सीटों के साथ बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना सुरक्षित स्थिति में दिख रही है। बहुमत के लिए 114 की जरूरत है और उनके पास 4 सीटें अतिरिक्त हैं। मगर संजय राउत के बयान ने स्पष्ट कर दिया है कि मेयर के चुनाव तक मुंबई में ‘आंकड़ों की बाजीगरी’ और ‘जोड़-तोड़ की राजनीति’ जारी रहेगी।

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