जानें 1949 के उस ऐतिहासिक फैसले की कहानी, जिसने सेना को रखा आरक्षण से दूर
नई दिल्ली। भारतीय सेना दुनिया की सबसे शक्तिशाली और पेशेवर सेनाओं में से एक मानी जाती है। इसकी इस सफलता और अनुशासन के पीछे एक सबसे बड़ा कारण इसकी भर्ती प्रक्रिया है, जो पूरी तरह से मेरिट (योग्यता) पर आधारित है। जहाँ देश के लगभग सभी संस्थानों में जाति या धर्म आधारित आरक्षण की व्यवस्था है, वहीं भारतीय सेना ने आजादी के बाद से ही खुद को इस दायरे से बाहर रखा है।
1949 का वह फैसला जिसने इतिहास बदल दिया
आजादी के तुरंत बाद, साल 1949 में सेना के नेतृत्व के सामने यह प्रस्ताव आया था कि सैन्य भर्ती में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण लागू किया जाए।
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कमांडर इन चीफ का रुख: स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय कमांडर इन चीफ फील्ड मार्शल के.एम. करिअप्पा ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया था।
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तर्क: उनका मानना था कि सेना के मानकों में किसी भी तरह की ढील देना सीधे तौर पर युद्ध की तैयारी से समझौता करना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि युद्ध के मैदान में केवल शारीरिक और मानसिक श्रेष्ठता ही मायने रखती है, आरक्षण नहीं।
सेना में आरक्षण न होने के मुख्य सिद्धांत
सेना की कार्यप्रणाली नागरिक सेवाओं से बिल्कुल अलग होती है। यहाँ आरक्षण न होने के पीछे निम्नलिखित ठोस कारण हैं:
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ऑपरेशनल प्रभावशीलता: युद्ध के मैदान में सैनिक की जान उसकी शारीरिक फिटनेस, त्वरित निर्णय लेने की क्षमता और साहस पर टिकी होती है। यहाँ प्रशासनिक समायोजन की कोई गुंजाइश नहीं होती।
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एकल और समरूप बल: सेना में सैनिक किसी जाति या क्षेत्र के बजाय केवल भारत माता के सैनिक के रूप में लड़ते हैं। आरक्षण व्यवस्था इकाई के अंदर आंतरिक विभाजन पैदा कर सकती है, जो मनोबल और अनुशासन को प्रभावित कर सकती है।
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शून्य त्रुटि (Zero Error): युद्ध में गलती की सजा मौत होती है। इसलिए, चयन के मानक केवल फिटनेस और प्रशिक्षण पर ही आधारित रखे गए हैं।
हालिया बदलाव: लिंग आधारित कोटा भी खत्म (अगस्त 2025)
हालांकि सेना में जातिगत आरक्षण कभी नहीं रहा, लेकिन कुछ शाखाओं में पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग अनुपात तय थे। इस दिशा में अगस्त 2025 में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला:
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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: कोर्ट ने ‘जज एडवोकेट जनरल’ (JAG) ब्रांच में पुरुषों और महिलाओं के बीच 6:3 के अनुपात को खत्म कर दिया।
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नया नियम: अब भर्ती पूरी तरह से एक संयुक्त मेरिट लिस्ट (Joint Merit List) के आधार पर होगी, जो लैंगिक समानता और शुद्ध योग्यता को बढ़ावा देती है।
भारतीय सेना की यह अपरिवर्तनीय नीति इसे एक निष्पक्ष और अनुशासित संस्था बनाती है। फील्ड मार्शल करिअप्पा के सिद्धांतों का आज भी पालन किया जा रहा है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि देश की सीमाएं केवल सबसे सक्षम हाथों में सुरक्षित रहें।
