रहस्यों की नगरी काशी: जानें बनारस की 7 अनकही परंपराएं

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Varanasi

वाराणसी: काशी (वाराणसी) केवल एक शहर नहीं, बल्कि जीती-जागती परंपराओं और लोकविश्वासों का वह संगम है, जिसे समझना भारत की आत्मा को समझने जैसा है। बीएचयू (BHU) के न्यूरोलॉजिस्ट प्रोफेसर विजय नाथ मिश्र की पुस्तक ‘दंडपाणि च भैरवम्’ में काशी की कुछ ऐसी ही असाधारण विरासतों का जिक्र किया गया है, जो आधुनिक विज्ञान और तर्क से परे एक अलग ही संसार रचती हैं।

आइए जानते हैं काशी की उन 7 अनोखी परंपराओं के बारे में जो इस नगर को ‘असाधारण’ बनाती हैं:

1. उल्टा निर्माण: पहले छत, फिर दीवार और अंत में नींव

पक्के महाल के पुराने घरों को बनाने की पद्धति पूरी दुनिया में सबसे अनोखी है। यहां घर नीचे से ऊपर नहीं, बल्कि ऊपर से नीचे की ओर बनते दिखाई देते हैं। पहले छत की ढलाई होती है, फिर दीवारें खड़ी की जाती हैं और सबसे अंत में नींव भरी जाती है। यह वास्तु कला आज भी शोध का विषय है।

2. जीवंत भक्त: भगवान के द्वारपाल की तरह पूजा

गाय घाट वाली गली, पाटन दरवाजा के पास ‘संहार भैरव’ के दो ऐसे भक्त स्थापित हैं जिनकी पूजा किसी पत्थर की मूर्ति की तरह नहीं, बल्कि एक जीवंत व्यक्ति की तरह हर रोज की जाती है। इन्हें भगवान के द्वारपाल के रूप में माना जाता है।

3. बाबा विश्वनाथ का ‘डेली रूटीन’

काशी में मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ दिन भर विश्राम नहीं करते, बल्कि विचरण करते हैं।

  • ब्रह्म मुहूर्त: विश्वनाथ मंदिर में सभी ज्योतिर्लिंगों के साथ विराजमान।

  • सुबह: आत्मविश्ववेशर शिवलिंग में उपस्थिति।

  • दोपहर: त्रिपुरांतकेश्वर शिवलिंग में वास।

  • सावन: इस दौरान वे सारनाथ में अपने साले सारंगनाथ के साथ विश्राम करते हैं।

4. भारतीय मिलिट्री और काशी का संबंध

आज जिसे हम ‘राष्ट्रपति के अंगरक्षक’ (President’s Bodyguard) के रूप में जानते हैं, उसकी जड़ें काशी से जुड़ी हैं। इसकी स्थापना काशी नरेश महाराज चेत सिंह जी ने सन् 1774 में अपने 18 घुड़सवारों के साथ की थी, जो भारतीय मिलिट्री की पहली रेजिमेंट मानी जाती है।

5. मणिकर्णिका की अनोखी रामलीला

पूरी दुनिया में रामलीला क्वार (सितंबर-अक्टूबर) के महीने में होती है, लेकिन मणिकर्णिका घाट पर यह कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर) मास में आयोजित होती है। संकरी गलियों के कारण यहां के विमान और रावण-कुंभकर्ण के पुतले भी विशेष रूप से छोटे आकार के बनाए जाते हैं।

6. दिव्य चिकित्सक: जहां दवाओं से नहीं, दर्शन से होता है इलाज

काशी में विभिन्न रोगों के निवारण के लिए विशिष्ट देवी-देवताओं के दर्शन की परंपरा है:

  • बुखार के लिए: ज्वरहरेश्वर महादेव।

  • चेचक के लिए: मां शीतला।

  • स्वप्न दोष के लिए: स्वप्नेश्वरी देवी।

  • मानसिक शक/वहम के लिए: शक्का देवी।

  • निसंतान दंपतियों के लिए: लोलार्केश्वर महादेव।

7. भदैनी मोहल्ला: मृत्यु के अपने नियम

काशी में आमतौर पर डोम राजा के प्रतिनिधि ही मुखाग्नि के लिए कर (Tax) लेकर आग देते हैं, लेकिन भदैनी मोहल्ला इस मामले में अलग है। यहां के निवासी जब अपने किसी परिजन का शव ले जाते हैं, तो आग अपने ही मोहल्ले से लेकर जाते हैं। चिता सजाने से लेकर अग्नि देने तक का सारा काम वे स्वयं करते हैं।

प्रोफेसर विजय नाथ मिश्र की नजर से देखें तो काशी एक ऐसा ‘म्यूजियम’ है जहां इतिहास, धर्म और चिकित्सा पद्धति एक साथ सांस लेते हैं। यहां की हर गली एक कहानी है और हर पत्थर एक परंपरा।

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