क्या आप भी भारत में एयरलाइन शुरू करना चाहते है? जाने क्या है प्रकिया

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air line

नई दिल्ली: भारतीय आसमान में अपनी एयरलाइन उड़ाना कई बड़े बिजनेस घरानों का सपना होता है, लेकिन यह प्रक्रिया केवल हवाई जहाज खरीदने या टिकट बेचने तक सीमित नहीं है। भारत में एक नई एयरलाइन शुरू करना एक लंबी, जटिल और कई स्तरों वाली कानूनी व तकनीकी प्रक्रिया है। सुरक्षा और संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार ने इसके लिए बेहद कड़े मानक तय किए हैं।

1. शुरुआत: विजन और पंजीकरण (Registration)

किसी भी कंपनी के लिए पहला कदम यह तय करना है कि वह किस श्रेणी में काम करना चाहती है—घरेलू यात्री सेवा, कार्गो (माल ढुलाई) या चार्टर ऑपरेशन।

  • भारतीय स्वामित्व: विमानन नियमों के अनुसार, कंपनी का भारत में पंजीकृत होना और उसका मुख्यालय देश के भीतर होना अनिवार्य है।

  • FDI नीति: भारत की एफडीआई (FDI) नीति के तहत कंपनी का मुख्य नियंत्रण और स्वामित्व भारतीय नागरिकों के हाथ में होना चाहिए।

2. विस्तृत बिजनेस प्लान: घाटे से उबरने की रणनीति भी जरूरी

मंजूरी की प्रक्रिया शुरू होने से पहले कंपनी को एक ठोस ‘बिजनेस ब्लूप्रिंट’ तैयार करना होता है। इसमें निम्नलिखित जानकारी देनी होती है:

  • किन रूट्स पर उड़ानें संचालित की जाएंगी?

  • विमानों की संख्या और प्रकार क्या होगा?

  • वित्तीय स्रोत क्या हैं और यदि कंपनी को शुरुआती दौर में घाटा होता है, तो उससे उबरने का बैकअप प्लान क्या है?

3. मंजूरी का पहला पड़ाव: नागरिक उड्डयन मंत्रालय से NOC

योजना तैयार होने के बाद सबसे पहले नागरिक उड्डयन मंत्रालय (Ministry of Civil Aviation) से ‘अनापत्ति प्रमाणपत्र’ (NOC) लेना होता है। यह सर्टिफिकेट इस बात का प्रमाण है कि सरकार को आपकी एयरलाइन के अस्तित्व पर कोई आपत्ति नहीं है। इसके लिए प्रमोटर्स की प्रोफाइल, फंडिंग का स्रोत और शेयरहोल्डिंग पैटर्न की गहन जांच की जाती है।

4. सबसे बड़ी चुनौती: DGCA का एयर ऑपरेटर सर्टिफिकेट (AOC)

NOC मिलने के बाद असली तकनीकी परीक्षा शुरू होती है। नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) से ‘एयर ऑपरेटर सर्टिफिकेट’ लेना सबसे महत्वपूर्ण कदम है।

  • ऑडिट और ट्रायल: DGCA यह जांचता है कि कंपनी के पास योग्य पायलट, प्रशिक्षित क्रू, अनुभवी इंजीनियर और मजबूत सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली (SMS) है या नहीं।

  • ट्रायल फ्लाइट्स: सर्टिफिकेट जारी करने से पहले कई चरणों में ऑडिट, दस्तावेजों का सत्यापन और ट्रायल फ्लाइट्स (परीक्षण उड़ानें) आयोजित की जाती हैं।

5. इंफ्रास्ट्रक्चर और अरबों का निवेश

राष्ट्रीय स्तर की एयरलाइन बनने के लिए केवल जहाज काफी नहीं हैं, बल्कि एक विशाल बुनियादी ढांचे की जरूरत होती है:

  • विमानों का बेड़ा: आधुनिक विमानों की खरीद या लीजिंग के लिए अरबों रुपये का निवेश।

  • MRO सुविधा: विमानों की मरम्मत और रखरखाव के लिए मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (MRO) सुविधाएं।

  • ट्रेनिंग और IT: स्टाफ के लिए सिम्युलेटर और ट्रेनिंग अकादमियां। साथ ही, टिकट बुकिंग और ऑपरेशन के लिए एक मजबूत डिजिटल आईटी सिस्टम।

6. सुरक्षा और पर्यावरण के सख्त मानक

एयरलाइन को न केवल भारतीय ‘एयरक्राफ्ट एक्ट’ और ‘डीजीसीए’ के नियमों का पालन करना होता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ICAO के मानकों पर भी खरा उतरना पड़ता है।

  • सुरक्षा क्लियरेंस: गृह मंत्रालय और खुफिया एजेंसियों से क्लियरेंस लेना अनिवार्य है।

  • पर्यावरण नियम: ध्वनि प्रदूषण, ईंधन उत्सर्जन और एयरपोर्ट संचालन से जुड़े पर्यावरणीय नियमों का पालन कानूनी बाध्यता है।

निष्कर्ष: भारत में एयरलाइन बिजनेस में कदम रखना जितनी बड़ी उपलब्धि है, उसे जमीन पर उतारना उतना ही चुनौतीपूर्ण है। सुरक्षा, नियम और भारी निवेश के बीच जो कंपनियां इन सभी पैमानों पर खरी उतरती हैं, वही अंततः भारतीय आसमान में उड़ान भर पाती हैं।

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