‘वंदे मातरम’ की जगह ‘जन गण मन’ को क्यों चुना राष्ट्रगान
नई दिल्ली। संसद में सोमवार को ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने पर 10 घंटे की विशेष चर्चा हो रही है। इससे एक दिन पहले बीजेपी ने दावा किया कि यह बहस एक बार फिर पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के उन कारणों को उजागर करेगी, जिनकी वजह से उन्होंने वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गान बनने नहीं दिया। बीजेपी सांसद संबित पात्रा ने कहा कि चर्चा में यह साफ होगा कि नेहरू ने जन गण मन को राष्ट्रीय गान के लिए क्यों अधिक उपयुक्त माना।
नेहरू का मुद्दा फिर क्यों उठा?
पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया था कि पार्टी ने वंदे मातरम् के कुछ पद हटाए और इसे धार्मिक आधार पर विवादित बनाया। कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज कर कहा था कि प्रधानमंत्री ने 1937 की ऐतिहासिक बैठक के नेताओं का अपमान किया है, जिसमें वंदे मातरम् पर प्रस्ताव पारित हुआ था। इसी विवाद के बीच नेहरू के वे तर्क फिर सुर्खियों में हैं, जो उनकी चिट्ठियों और भाषणों में दर्ज हैं और नेहरू आर्काइव में उपलब्ध हैं।
नेहरू का कैबिनेट नोट: राष्ट्रीय गान के लिए क्या मानक होने चाहिए?
21 मई 1948 को लिखे कैबिनेट नोट में नेहरू ने कहा कि राष्ट्रीय गान केवल शब्दों का नहीं, बल्कि ऐसी धुन का होना चाहिए जो ऑर्केस्ट्रा, सैन्य बैंड और विभिन्न राष्ट्रीय अवसरों पर आसानी से बजाई जा सके।
नेहरू के अनुसार:
-
जन गण मन इन मानकों को पूरा करता है।
-
वंदे मातरम्, सुंदर होने के बावजूद, धीमी, विलाप जैसी और दोहराव वाली धुन है।
-
विदेशी बैंड और दर्शकों के लिए इसे समझना और बजाना कठिन है।
-
वंदे मातरम् की भाषा आम लोगों के लिए जटिल है, जबकि जन गण मन अपेक्षाकृत सरल है।
उन्होंने लिखा कि वंदे मातरम् स्वतंत्रता संघर्ष की भावना को दर्शाता है, जबकि राष्ट्रीय गान में उपलब्धि, भविष्य और आत्मविश्वास का संगीत होना चाहिए।
“मुसलमानों के विरोध की वजह नहीं” — नेहरू का स्पष्टीकरण
15 जून 1948 को बंगाल के मुख्यमंत्री बी.सी. रॉय को लिखे पत्र में नेहरू ने स्पष्ट किया कि उनका निर्णय किसी धार्मिक विरोध की वजह से नहीं था।
उनके अनुसार:
-
वंदे मातरम् राष्ट्रीय गीत के रूप में सम्मानित रहेगा।
-
राष्ट्रीय गान की प्रकृति अलग होती है—वह संघर्ष का नहीं, उपलब्धि का गीत होता है।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखी चिट्ठी: धुन उपयुक्त नहीं
21 जून 1948 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखे पत्र में नेहरू ने फिर दोहराया कि:
-
वंदे मातरम् की धुन ऑर्केस्ट्रा के लिए उपयुक्त नहीं।
-
जन गण मन देश और विदेश में तुरंत प्रभाव डालता है।
उनके अनुसार वंदे मातरम् भावनात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, पर धुन के कारण राष्ट्रीय गान के रूप में उपयुक्त नहीं।
संविधान सभा में नेहरू का बयान: “वंदे मातरम् प्रमुख राष्ट्रीय गीत रहेगा”
25 अगस्त 1948 को संविधान सभा में नेहरू ने कहा:
-
वंदे मातरम् भारत का प्रमुख राष्ट्रीय गीत है और रहेगा।
-
राष्ट्रीय गान ऐसा होना चाहिए जो भारतीय और पश्चिमी दोनों संगीत शैलियों में सहजता से बज सके।
-
जन गण मन की धुन इस कसौटी पर खरी उतरती है, जबकि वंदे मातरम् में अंतरराष्ट्रीय मंचों के अनुरूप गति और संरचना नहीं है।
नेहरू ने यह भी कहा कि अंतिम निर्णय संविधान सभा का है—चाहे वह जन गण मन को चुने, वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत बनाए रखे या किसी नई धुन का चयन करे।
नेहरू के तर्क मुख्यतः संगीत, भाषा की सरलता, अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता और राष्ट्रीय गीत एवं राष्ट्रीय गान के भाव के अंतर पर आधारित थे। आज 150 साल की चर्चा के बहाने वही ऐतिहासिक तर्क राजनीति और संसद दोनों में फिर से केंद्र में आ गए हैं।
