UGC विवाद: SC/ST और OBC को यूनिवर्सिटी या कॉलेज में कितना मिलता है आरक्षण?
नई दिल्ली | यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) द्वारा कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए लागू किए गए नए नियमों ने देशभर में बहस छेड़ दी है। इन नियमों के तहत अब एससी (SC) और एसटी (ST) के साथ-साथ ओबीसी (OBC) छात्रों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को भी शामिल किया गया है, जिसका एक पक्ष स्वागत कर रहा है तो वहीं दूसरा पक्ष (सामान्य वर्ग) विरोध दर्ज करा रहा है।
क्या हैं नए नियम?
यूजीसी ने सभी शैक्षणिक संस्थानों को निर्देश दिया है कि वे पिछड़े वर्ग के छात्रों की शिकायतों के निवारण के लिए एक विशेष कमेटी का गठन करें। इस कमेटी को न केवल शिकायतें सुनने बल्कि उन पर सख्त एक्शन लेने का अधिकार भी दिया गया है।
आरक्षण का मौजूदा गणित: किसे कितना लाभ?
विवाद के बीच एक बार फिर शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के प्रतिशत को लेकर चर्चा तेज है। वर्तमान में आरक्षण की व्यवस्था इस प्रकार है:
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अनुसूचित जाति (SC): 15% आरक्षण
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अनुसूचित जनजाति (ST): 7.5% आरक्षण
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अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): 27% आरक्षण (मंडल कमीशन की सिफारिशों के बाद)
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EWS (आर्थिक रूप से पिछड़ा): 10% आरक्षण (2019 से प्रभावी)
सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी मामले के फैसले के अनुसार, कुल आरक्षण की सीमा (EWS को छोड़कर) 50% पर कैप की गई है।
बढ़ रही है भागीदारी
शिक्षा मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, आरक्षण और भेदभाव विरोधी नीतियों के चलते शैक्षणिक संस्थानों में एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के नामांकन (Registration) में भारी बढ़ोतरी हुई है। आंकड़ों के मुताबिक, 2024-25 में इन वर्गों के छात्रों के प्रवेश का आंकड़ा 3.85 करोड़ से बढ़कर 4.13 करोड़ तक पहुंच गया है।
विरोध की वजह
सवर्ण और सामान्य वर्ग के कई छात्र इन नियमों का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि नए नियमों और आरक्षण के प्रावधानों से प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो रही है। सोशल मीडिया पर भी आरक्षण को लेकर ‘क्रीमी लेयर’ और ‘50% कैप’ जैसे नियमों पर तीखी बहस चल रही है।
यूजीसी का कहना है कि इन नियमों का मुख्य उद्देश्य कैंपस में समावेशी वातावरण तैयार करना है ताकि किसी भी छात्र को उसकी जाति के आधार पर मानसिक या शैक्षणिक प्रताड़ना का सामना न करना पड़े।
