ताशकंद समझौता और शास्त्री जी की रहस्यमयी मृत्यु: 60 साल बाद भी अनसुलझे हैं कई सवाल
नई दिल्ली | 11 जनवरी 1966 की वह रात भारतीय इतिहास के पन्नों में एक ऐसे घाव की तरह दर्ज है, जो आज भी ताजा है। ताशकंद समझौते के महज कुछ घंटों बाद देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का विदेशी धरती पर निधन हो गया। सरकारी तौर पर इसे ‘दिल का दौरा’ बताया गया, लेकिन दशकों बाद भी यह सवाल कायम है कि क्या उनकी मृत्यु प्राकृतिक थी या इसके पीछे कोई गहरी साजिश?
समझौते की खुशी और फिर मातम
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद शांति बहाली के लिए तत्कालीन सोवियत संघ (अब उज्बेकिस्तान) के ताशकंद में वार्ता आयोजित की गई थी। समझौते पर हस्ताक्षर के बाद उसी रात शास्त्री जी की तबीयत अचानक बिगड़ी और उनका निधन हो गया। अगले दिन उनका पार्थिव शरीर दिल्ली लाया गया, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद की प्रक्रिया ने कई विवादों को जन्म दिया।
पोस्टमार्टम न होना: सबसे बड़ी चूक या कूटनीतिक मजबूरी?
शास्त्री जी की मृत्यु को लेकर उठने वाले सवालों में सबसे बड़ा सवाल यह है कि उनका पोस्टमार्टम क्यों नहीं कराया गया? इसके पीछे कुछ प्रमुख तर्क दिए जाते हैं:
-
प्राकृतिक मृत्यु का निष्कर्ष: ताशकंद में मौजूद भारतीय और सोवियत डॉक्टरों ने इसे ‘हार्ट अटैक’ माना। तत्कालीन मानकों के अनुसार, प्राकृतिक मृत्यु की स्थिति में पोस्टमार्टम अनिवार्य नहीं था।
-
अंतरराष्ट्रीय संबंध: भारत और सोवियत संघ के बीच गहरे रणनीतिक रिश्ते थे। भारत सरकार ने सोवियत मेडिकल रिपोर्ट पर भरोसा किया और संबंधों में खटास आने के डर से दोबारा जांच की जरूरत नहीं समझी।
-
परिवार की स्थिति: शास्त्री जी की पत्नी ललिता शास्त्री ने बाद में कहा कि शोक के उस माहौल में उनसे पोस्टमार्टम के लिए औपचारिक अनुमति नहीं ली गई।
चश्मदीदों के दावे: कुलदीप नैयर की ‘बियांड द लाइंस’
जाने-माने पत्रकार कुलदीप नैयर, जो उस समय शास्त्री जी के साथ ताशकंद में थे, ने अपनी आत्मकथा में उस रात का रोंगटे खड़े कर देने वाला विवरण दिया है। नैयर के अनुसार:
-
शास्त्री जी का पार्थिव शरीर देखने पर उनके चेहरे और त्वचा पर अस्वाभाविक नीलापन था।
-
उनका चेहरा भी काफी सूजा हुआ दिख रहा था।
-
नैयर ने अपनी किताब में स्पष्ट लिखा कि जो उन्होंने देखा, वह सामान्य हार्ट अटैक के लक्षणों से मेल नहीं खाता था।
मेडिकल हिस्ट्री: क्या शास्त्री जी ‘हाई-रिस्क’ मरीज थे?
ताशकंद जाने से पहले शास्त्री जी की सेहत को लेकर डेटा इस प्रकार है:
| विवरण | विवरण/स्थिति |
| पहला हार्ट अटैक | 1959-60 के दौरान |
| मेडिकल श्रेणी | हाई-रिस्क कार्डियक पेशेंट |
| ताशकंद में स्थिति | भीषण ठंड, अत्यधिक थकान और मानसिक दबाव |
| डॉक्टरों की सलाह | तनाव और ठंड से बचने का निर्देश |
विज्ञान का नजरिया: नीलापन क्यों पड़ता है?
फॉरेंसिक विशेषज्ञों के अनुसार, मृत्यु के बाद शरीर का नीला पड़ना एक प्राकृतिक प्रक्रिया भी हो सकती है जिसे ‘लीवर मोर्टिस’ कहा जाता है।
-
मृत्यु के बाद जब दिल धड़कना बंद कर देता है, तो खून गुरुत्वाकर्षण के कारण शरीर के निचले हिस्सों में जमा होने लगता है, जिससे त्वचा नीली या बैंगनी दिखने लगती है।
-
हालांकि, यह नीलापन ऑक्सीजन की कमी (दम घुटने) या जहर दिए जाने की स्थिति में भी हो सकता है, जिसकी पुष्टि केवल पोस्टमार्टम से ही संभव थी।
निष्कर्ष: इतिहास के गर्भ में छिपा सच
शास्त्री जी एक जनप्रिय नेता थे। उनकी सादगी और ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा आज भी गूंजता है। लेकिन ताशकंद की वह रात आज भी एक पहेली बनी हुई है। पोस्टमार्टम न होना और शरीर के रंग को लेकर उठे सवालों ने इस घटना को भारत के सबसे बड़े राजनीतिक रहस्यों में से एक बना दिया है।
