कीझाड़ी: 1000 साल पहले एक प्रलयकारी बाढ़ ने दफन कर दी यह महान सभ्यता

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sindhu ghaatee sabhyata

नई दिल्ली/मदुरै | डिजिटल डेस्क। भारत की मिट्टी के नीचे न जाने कितने साम्राज्य और सभ्यताएं दफन हैं। इन्हीं में से एक है ‘कीझाड़ी’ (Keezhadi), जिसे दक्षिण भारत की ‘सिंधु घाटी सभ्यता’ कहा जाता है। वर्षों से वैज्ञानिक और पुरातत्वविद इस गुत्थी को सुलझाने में लगे थे कि आखिर इतनी विकसित और आधुनिक सभ्यता अचानक कहां गायब हो गई? अब भू-वैज्ञानिकों ने इस रहस्य से पर्दा उठा दिया है।

वैगई नदी का वो ‘महा-प्रलय’: मिट्टी की परतों ने खोली पोल

हालिया शोध और मिट्टी के नमूनों के अध्ययन से यह साफ हो गया है कि कीझाड़ी का अंत किसी युद्ध या आक्रमण से नहीं, बल्कि प्रकृति के कहर से हुआ था। वैगई नदी के किनारे फली-फूली यह सभ्यता आज से लगभग 1000 साल पहले (11वीं सदी) एक भीषण बाढ़ की चपेट में आ गई थी।

पुरातत्वविदों को खुदाई के दौरान मिट्टी और महीन रेत की एक मोटी परत मिली है, जो केवल तभी बनती है जब नदी का पानी लंबे समय तक किसी स्थान पर ठहरा रहे। वैज्ञानिकों का मानना है कि पानी का बहाव इतना तेज था कि लोगों को संभलने का मौका तक नहीं मिला। खुदाई में जिस स्थिति में बर्तन और सामान मिले हैं, उससे संकेत मिलता है कि लोग अपनी जान बचाने के लिए अपना सब कुछ छोड़कर अचानक भागे थे।

कितनी पुरानी और कितनी आधुनिक थी कीझाड़ी?

कार्बन डेटिंग से पुख्ता हुआ है कि कीझाड़ी सभ्यता की शुरुआत 600 ईसा पूर्व हुई थी। यह खोज उन दावों को सच साबित करती है कि तमिलनाडु में शहरीकरण और साक्षरता का इतिहास बेहद प्राचीन है।

कीझाड़ी की कुछ प्रमुख विशेषताएं:

  • साक्षर समाज: यहाँ मिले मिट्टी के बर्तनों पर ‘तमिल-ब्राह्मी’ लिपि खुदी हुई है, जो साबित करती है कि यहाँ के लोग पढ़ना-लिखना जानते थे।

  • इंजीनियरिंग का नमूना: खुदाई में पक्की ईंटों के घर और आज के दौर जैसा शानदार ड्रेनेज सिस्टम (निकासी प्रणाली) मिला है।

  • वैश्विक व्यापार: यहाँ हाथीदांत की वस्तुएं, सोने के गहने और कीमती पत्थरों के मनके मिले हैं, जो संकेत देते हैं कि इनका व्यापार विदेशों से भी था।

  • कपड़ा उद्योग: खुदाई में मिली तकली और बुनाई के औजारों से पता चलता है कि यह इलाका कपड़ों के उत्पादन का एक बड़ा केंद्र रहा होगा।

संगम काल की कहानियों का जीवंत प्रमाण

कीझाड़ी के अवशेषों ने तमिल इतिहास के ‘संगम काल’ की कहानियों को पुरातात्विक आधार दिया है। दक्षिण भारत के इतिहास में चोल और पांड्य राजाओं के समय भी भीषण बाढ़ों का उल्लेख मिलता है। माना जा रहा है कि 11वीं सदी की किसी काली रात में वैगई नदी ने अपना रास्ता बदला और पूरी की पूरी आधुनिक बस्ती मलबे और गाद के नीचे दब गई।

इतिहास से आज की सीख

कीझाड़ी का बाढ़ में दफन होना हमें याद दिलाता है कि जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाएं किसी भी विकसित सभ्यता का भाग्य बदलने की ताकत रखती हैं। आज जब हम कीझाड़ी को फिर से मिट्टी से बाहर निकाल रहे हैं, तो हमें न केवल अपने गौरवशाली अतीत का पता चल रहा है, बल्कि यह सीख भी मिल रही है कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाना कितना अनिवार्य है।

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