भारत में सबसे सुरक्षित 3 बैंक कौन से हैं? RBI ने किसे D-SIB सूची में किया शामिल
नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक बार फिर देश के तीन सबसे बड़े बैंकों—स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI), एचडीएफसी बैंक (HDFC Bank) और आईसीआईसीआई बैंक (ICICI Bank)—को घरेलू व्यवस्थागत रूप से महत्वपूर्ण बैंक (Domestic Systemically Important Banks – D-SIB) घोषित किया है। इन बैंकों को देश की बैंकिंग प्रणाली में सबसे स्थिर और “सुरक्षित” माना जाता है।
आरबीआई ने कहा कि ये तीनों बैंक पिछले वर्ष की तरह इस बार भी उसी बकेट संरचना में शामिल किए गए हैं। इनका आकार, नेटवर्क, ग्राहक आधार और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव इतना बड़ा है कि इनके संकट में आने पर पूरे वित्तीय तंत्र पर गंभीर असर पड़ सकता है। इसलिए इन पर अन्य बैंकों की तुलना में अधिक सख्त नियामकीय निगरानी और अतिरिक्त पूंजी रखने का दायित्व लागू होता है।
बैंकों पर लगेगी अतिरिक्त CET1 पूंजी की शर्त
RBI द्वारा जारी सूची के अनुसार SBI को बकेट-4 में रखा गया है और इसे 0.80% अतिरिक्त CET1 पूंजी रखनी होगी। HDFC Bank को बकेट-2 में रखा गया है, जहां 0.40% अतिरिक्त CET1 की जरूरत होगी। ICICI Bank को बकेट-1 में रखा गया है, जिसमें 0.20% अतिरिक्त CET1 पूंजी रखनी होगी। ये अतिरिक्त पूंजी आवश्यकताएं 1 अप्रैल 2027 से लागू होंगी। यह पूंजी कैपिटल कंजर्वेशन बफर के अतिरिक्त होगी, जिससे इन बैंकों की वित्तीय मजबूती बढ़ेगी।
क्या है D-SIB फ्रेमवर्क?
दुनिया भर में वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्थागत रूप से महत्वपूर्ण बैंकों की पहचान की जाती है। इसी उद्देश्य से RBI ने 2014 में D-SIB फ्रेमवर्क लागू किया था। 2015 में सबसे पहले SBI को D-SIB घोषित किया गया। 2016 में ICICI Bank और 2017 में HDFC Bank को इस सूची में शामिल किया गया।
D-SIB बैंक अर्थव्यवस्था के लिए इतने महत्वपूर्ण होते हैं कि इनके असफल होने पर वित्तीय प्रणाली पर बड़ा संकट आ सकता है। इसलिए इन पर अतिरिक्त निगरानी, स्ट्रेस टेस्टिंग और पूंजी प्रबंधन के कड़े मानक लागू होते हैं। आवश्यकता पड़ने पर सरकार भी इन बैंकों को बचाने के लिए हस्तक्षेप कर सकती है।
देश की बैंकिंग परिसंपत्तियों का 40–45% हिस्सा
इन तीनों बैंकों का देश की कुल बैंकिंग परिसंपत्तियों में 40–45% हिस्सा है। इसलिए इनकी स्थिरता भारतीय बैंकिंग सिस्टम और पूरी अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। आरबीआई का यह कदम वित्तीय तंत्र को मजबूत और सुरक्षित बनाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
