गवर्नर बिलों को अनिश्चितकाल तक रोक नहीं सकते: सुप्रीम कोर्ट

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया कि राज्यपाल विधानसभा से पारित किसी बिल को अनिश्चितकाल तक रोक नहीं सकते। अदालत ने कहा कि गवर्नर के पास किसी भी विधेयक पर निर्णय लेने के केवल तीन विकल्प हैं—

  1. बिल को मंजूरी देना

  2. बिल को दोबारा विचार के लिए विधानसभा को भेजना

  3. बिल को राष्ट्रपति के पास भेजना

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल के पास किसी बिल को रोककर रखने या वीटो लगाने जैसा अधिकार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

बिलों की मंजूरी से जुड़े मामले पर अपना फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

  • राज्यपाल के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती, क्योंकि यह संवैधानिक शक्तियों के विभाजन (Separation of Powers) का उल्लंघन होगा।

  • यदि अनुचित देरी होती है, और वह संवैधानिक प्रक्रिया को प्रभावित करती है, तो सुप्रीम कोर्ट दखल दे सकता है।

  • बिल को बिना प्रक्रिया अपनाए रोककर रखना संघवाद (Federalism) का उल्लंघन है।

पांच जजों की बेंच ने सर्वसम्मति से कहा कि राज्यपाल की भूमिका संवैधानिक सीमाओं में बंधी है और वे विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को मनमाने तरीके से रोक नहीं सकते।

तमिलनाडु विवाद से उठा मामला

यह पूरा मामला तमिलनाडु के राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच विवाद से शुरू हुआ। राज्यपाल ने कई विधेयकों को लंबे समय तक लंबित रखा था, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

8 अप्रैल 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि:

  • राज्यपाल के पास कोई वीटो पावर नहीं है

  • राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को भेजे गए किसी बिल पर राष्ट्रपति को तीन महीने में निर्णय लेना होगा

इस आदेश पर राष्ट्रपति ने चिंता जताई और सुप्रीम कोर्ट से राय मांगते हुए 14 प्रश्न पूछे थे। इसी संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने विस्तृत फैसला सुनाया।

संघीय ढांचे पर खतरा: कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने संघीय संरचना पर जोर देते हुए कहा:

  • बिलों को बिना कार्रवाई के रोकना संवैधानिक कर्तव्यों का उल्लंघन है।

  • यह राज्य सरकारों की कार्यप्रणाली और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है।

  • अनुच्छेद 200 में तय प्रक्रिया का पालन किए बिना कोई बिल रोका नहीं जा सकता।

बेंच ने कहा कि यदि गवर्नर अनुच्छेद 200 में निर्दिष्ट विकल्पों का पालन नहीं करते, तो यह राज्यों के अधिकारों और संघवाद के सिद्धांत के खिलाफ होगा।

फैसले का महत्व

यह फैसला उन राज्यों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां राज्यपाल और निर्वाचित सरकारों के बीच टकराव देखने को मिलता है। कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि:

  • गवर्नर निर्वाचित सरकार के काम में बिना कारण बाधा नहीं डाल सकते

  • उनकी शक्तियाँ सीमित और प्रक्रिया-आधारित हैं

  • विधानमंडल की प्राथमिकता और जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों का निर्णय सर्वोपरि है