पत्रकारिता के एक शानदार युग का अंत: तीन दशकों के सफर के बाद ‘राष्ट्रीय सहारा’ बंद

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लखनऊ। भारतीय मीडिया जगत में अपनी एक अलग पहचान रखने वाले प्रतिष्ठित समाचार पत्र ‘राष्ट्रीय सहारा’ ने लगभग 34 वर्षों के गौरवशाली सफर के बाद अपनी बंदी की घोषणा कर दी है। 9 जनवरी 2026 को अखबार के प्रबंधन द्वारा आधिकारिक तौर पर परिचालन बंद करने के निर्णय ने पत्रकारिता जगत में शोक की लहर दौड़ा दी है। 16 फरवरी 1992 को उत्तर प्रदेश की धरती से शुरू हुआ यह अखबार केवल एक सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि पत्रकारों के सम्मान और आधुनिक पत्रकारिता का प्रतीक माना जाता था।

1992: जब ‘चमकते सितारे’ की तरह हुआ था उदय

राष्ट्रीय सहारा का उदय उस दौर में हुआ था जब पारंपरिक अखबारों का बोलबाला था। 16 फरवरी 1992 को जब इसका पहला संस्करण बाजार में आया, तो इसने मीडिया घरानों में हलचल मचा दी। उस समय के ‘झोलाछाप’ पत्रकार की छवि को बदलकर राष्ट्रीय सहारा ने पत्रकारों को एक कॉर्पोरेट पहचान दी। वातानुकूलित कार्यालय, मीटिंग्स के दौरान औपचारिक पहनावा (टाई) और बेहतरीन कार्य संस्कृति ने पत्रकारों के आत्मसम्मान को एक नई ऊंचाई प्रदान की थी।

सहाराश्री का वो दौर: जब पत्रकार के सम्मान के लिए झुक गया था प्रशासन

अखबार के शुरुआती दिनों को याद करते हुए वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि संस्थापक सुब्रत राय ‘सहाराश्री’ पत्रकारों के सम्मान के प्रति अत्यंत संवेदनशील थे। एक चर्चित घटना का जिक्र आज भी होता है, जब पैक्सफेड के एक अधिकारी द्वारा पत्रकार को थप्पड़ मारने पर सुब्रत राय ने स्वयं मोर्चा संभाला था। उन्होंने उस अधिकारी को दफ्तर बुलाकर सार्वजनिक माफी मंगवाई थी, जिसकी खबर अगले दिन पहले पन्ने पर छपी थी। यह संदेश था कि पत्रकार की हैसियत किसी भी रसूखदार अफसर से कम नहीं है।

विवादों और संघर्षों के बीच बनाई अपनी राह

राष्ट्रीय सहारा का सफर चुनौतियों भरा रहा। शुरुआत में कई बड़े मीडिया घरानों ने इसकी सप्लाई रोकने की कोशिश की, प्रतियों को जलाया गया और हॉकरों पर दबाव बनाया गया। लेकिन सहाराश्री ने हार नहीं मानी। नए हॉकरों की फौज खड़ी की गई और अखबार को घर-घर तक पहुँचाया गया। यही वह जिजीविषा थी जिसने राष्ट्रीय सहारा को तीन दशकों तक मजबूती से टिकाए रखा।

विपत्ति का पूर्वाभास और अंतिम विदाई

सहाराश्री के निधन से कुछ समय पूर्व ही संस्थान की माली हालत बिगड़ने लगी थी। हालांकि, कर्मचारियों का हौसला अंत तक बना रहा, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद संकट गहराता चला गया। जानकारों का कहना है कि बंदी का यह फैसला अचानक नहीं था; पिछले कुछ वर्षों से अखबार की सांसें उखड़ रही थीं और प्रबंधन व कर्मचारियों को इस अनहोनी का पूर्वाभास था।

9 जनवरी 2026 की तारीख अब इतिहास में उस दिन के रूप में दर्ज हो गई है, जब एक ऐसी संस्था ने विदा ली जिसने हिंदी पत्रकारिता को आधुनिकता और गरिमा का पाठ पढ़ाया था।

एक नजर: राष्ट्रीय सहारा का सफरनामा

  • स्थापना: 16 फरवरी 1992 (उत्तर प्रदेश)

  • विशेषता: पत्रकारों को आधुनिक कार्य-संस्कृति और कॉर्पोरेट पहचान दी।

  • चुनौतियां: शुरुआती दौर में प्रतियों का जलाया जाना और वितरण में बाधाएं।

  • पतन की शुरुआत: सहाराश्री के निधन के कुछ समय पूर्व से शुरू हुआ वित्तीय संकट।

  • अंतिम प्रकाशन: 9 जनवरी 2026।

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