अज़रबैजान के अग्नि मंदिर में देवनागरी में लिखा है ‘श्री गणेशाय नमः’

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Atashgah Fire Temple News Collage

बाकू, अज़रबैजान। अज़रबैजान की राजधानी बाकू के पास स्थित ऐतिहासिक अतेशगाह अग्नि मंदिर एक बार फिर भारत और अज़रबैजान के सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंधों को लेकर चर्चा में है। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शुक्रवार को इस ऐतिहासिक मंदिर का दौरा किया। उन्होंने मंदिर की तस्वीरें साझा करते हुए इसे दोनों देशों के लोगों के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक बताया।

इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां पत्थर के अभिलेखों पर देवनागरी लिपि में ‘श्री गणेशाय नमः’ सहित हिंदू देवी-देवताओं से संबंधित लेख मिलते हैं। यह स्थल भारतीय व्यापारियों, श्रद्धालुओं और पारसी अग्नि-पूजा परंपरा के ऐतिहासिक संपर्कों की कहानी भी बयां करता है।

मंदिर में मिले हैं देवनागरी के 18 अभिलेख

बाकू स्थित भारतीय दूतावास के अनुसार, अतेशगाह मंदिर परिसर में देवनागरी लिपि के 18 अभिलेख मौजूद हैं। इनमें से अधिकांश की शुरुआत भगवान गणेश की वंदना से होती है। कई अभिलेखों में देवी ज्वाला जी का उल्लेख भी मिलता है।

मंदिर में हिंदू धार्मिक परंपराओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण संकेत दिखाई देते हैं:

  • ‘ॐ श्री गणेशाय नमः’ — अधिकांश देवनागरी अभिलेखों में भगवान गणेश की वंदना।
  • देवी ज्वाला जी का उल्लेख — एक दर्जन से अधिक बार संदर्भ मिलने की जानकारी दी गई है।
  • स्वस्तिक चिह्न — छह अभिलेखों में इस पवित्र प्रतीक की मौजूदगी बताई गई है।
  • संस्कृत और पंजाबी लेख — भारतीय उपमहाद्वीप की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े संकेत।

ये अभिलेख इस बात के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप के श्रद्धालुओं और व्यापारियों का इस क्षेत्र से ऐतिहासिक संपर्क रहा था।

क्या है अतेशगाह अग्नि मंदिर का इतिहास?

‘अतेशगाह’ शब्द फ़ारसी भाषा से आया है, जिसका अर्थ है ‘अग्नि का घर’। यह मंदिर अज़रबैजान के अबशेरोन प्रायद्वीप में सुराखानी के पास स्थित है। यह क्षेत्र प्राकृतिक गैस के भंडार और जमीन से निकलने वाली ज्वालाओं के लिए प्रसिद्ध रहा है।

अज़रबैजान को अक्सर ‘अग्नि की भूमि’ कहा जाता है। प्राकृतिक गैस जमीन की दरारों से बाहर निकलकर हवा के संपर्क में आने पर आग पकड़ लेती थी। इसी प्राकृतिक घटना ने इस क्षेत्र को धार्मिक महत्व दिलाने में भूमिका निभाई।

इस स्थान की पुरानी परंपराओं को पारसी धर्म से भी जोड़ा जाता है। हालांकि, आज दिखाई देने वाला मंदिर परिसर मुख्य रूप से 17वीं से 19वीं शताब्दी के बीच निर्मित संरचनाओं से बना है। इसलिए यहां की प्राचीन अग्नि-पूजा परंपराओं और वर्तमान इमारतों के निर्माण काल को अलग-अलग समझना जरूरी है।

भारतीय व्यापारी और श्रद्धालु कैसे पहुंचे यहां?

ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, भारतीय व्यापारी और तीर्थयात्री व्यापारिक मार्गों के जरिए कैस्पियन सागर के आसपास के क्षेत्रों तक पहुंचते थे। अज़रबैजान एशिया और यूरोप को जोड़ने वाले व्यापारिक नेटवर्क का हिस्सा था।

माना जाता है कि भारतीय उपमहाद्वीप से आए श्रद्धालुओं ने अतेशगाह परिसर के निर्माण, रखरखाव और धार्मिक गतिविधियों में योगदान दिया। यूनेस्को को सौंपे गए अज़रबैजान के दस्तावेजों में इस स्थल का संबंध मुल्तान से आने वाले श्रद्धालुओं और व्यापारियों से भी जोड़ा गया है।

मुल्तान आज पाकिस्तान में स्थित है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से यह भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े व्यापारिक और सांस्कृतिक नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

मंदिर में हिंदू और सिख परंपराओं से जुड़े संस्कृत तथा पंजाबी अभिलेखों की मौजूदगी इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान की एक खास पहचान है।

17वीं से 19वीं शताब्दी के बीच विकसित हुआ परिसर

ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक, 17वीं शताब्दी में इस स्थान पर तीर्थयात्रियों की आवाजाही बढ़ी और मंदिर परिसर का पुनर्निर्माण तथा विस्तार हुआ। जर्मन यात्री एंगेलबर्ट कैम्फर ने 1683 में इस क्षेत्र का दौरा किया था और यहां की धार्मिक गतिविधियों का उल्लेख किया था।

समय के साथ मंदिर परिसर में अग्नि वेदी, पूजा स्थलों और यात्रियों के ठहरने के लिए कमरों जैसी संरचनाओं का विकास हुआ। 19वीं शताब्दी तक इसने अपना वर्तमान स्वरूप हासिल कर लिया था।

इस परिसर की विशेषता यह है कि इसकी वास्तुकला में भारतीय धार्मिक परंपराओं के साथ पारसी अग्नि-पूजा से जुड़ी शैली के संकेत भी दिखाई देते हैं।

1883 में बंद हुई पूजा, बाद में बना संग्रहालय

अज़रबैजान में तेल और गैस उद्योग के विस्तार के बाद अतेशगाह मंदिर में धार्मिक गतिविधियां धीरे-धीरे कम हो गईं। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, वर्ष 1883 में यहां पूजा बंद हो गई थी।

बाद में इस ऐतिहासिक स्थल को संरक्षित करने की दिशा में काम हुआ। वर्ष 1969 में इसका जीर्णोद्धार किया गया और 1975 में इसे संग्रहालय के रूप में विकसित किया गया। यह परिसर आज ऐतिहासिक और वास्तुशिल्प धरोहर के रूप में संरक्षित है।

अतेशगाह को यूनेस्को की विश्व धरोहर की संभावित सूची में शामिल किया गया है। इसे यूनेस्को की पूर्ण विश्व धरोहर सूची में शामिल होने का दावा करना सही नहीं होगा।

जयशंकर के दौरे का क्या है महत्व?

विदेश मंत्री एस. जयशंकर का अतेशगाह मंदिर दौरा भारत और अज़रबैजान के बीच सांस्कृतिक संबंधों को रेखांकित करता है। यह स्थल बताता है कि व्यापार, तीर्थयात्रा और धार्मिक परंपराओं के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों के लोगों के बीच सदियों से संपर्क बना रहा है।

देवनागरी में लिखे ‘श्री गणेशाय नमः’ जैसे अभिलेख इस इतिहास की खास झलक पेश करते हैं। अतेशगाह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप, कैस्पियन क्षेत्र और पश्चिम एशिया के बीच ऐतिहासिक संपर्कों का भी महत्वपूर्ण प्रतीक है।

 

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