Sanchar Nest पर जांच का शिकंजा: EOW जांच की मांग
गाजियाबाद। वेव सिटी स्थित Sanchar Nest Sahakari Awas Samiti का विवाद अब गंभीर जांच और कानूनी कार्रवाई के दौर में पहुंच गया है। वर्षों से रजिस्ट्री और कब्जे का इंतजार कर रहे फ्लैट खरीदारों की शिकायतों के बीच समिति के वित्तीय लेन-देन, फ्लैट आवंटन, अतिरिक्त शुल्क और प्रबंधन की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे हैं। उपलब्ध विभागीय दस्तावेजों में वर्ष 2009 से चल रही परियोजना और समिति के कामकाज से जुड़े विभिन्न आरोपों की जांच का उल्लेख है।
आवास विकास परिषद (आविप) के अधिकारियों के मुताबिक समिति के पदाधिकारियों द्वारा 506 फ्लैटों के निर्माण से जुड़े मामले में अनियमितताओं की शिकायतें सामने आईं। अधिकारियों के स्तर पर मामले में ₹100 करोड़ से अधिक की वित्तीय अनियमितताओं की आशंका जताए जाने की बात सामने आई है, हालांकि कथित घोटाले की अंतिम राशि की पुष्टि अभी जांच के बाद ही होगी।
फ्लैटों की रजिस्ट्री पर वर्षों से सवाल
समिति के सदस्यों ने लंबे समय से फ्लैटों की रजिस्ट्री नहीं होने, कथित तौर पर अनधिकृत वृद्धि शुल्क लगाए जाने और पदाधिकारियों द्वारा परेशान किए जाने की शिकायतें कीं।
अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) के स्तर से 23 दिसंबर 2025 को मामले की जांच कराई गई और जांच अधिकारी ने 30 दिसंबर 2025 को रिपोर्ट प्रस्तुत की। उपलब्ध विवरण के अनुसार रिपोर्ट में समिति के कामकाज में वित्तीय अनियमितताओं का उल्लेख किया गया।
रिपोर्ट में समिति के फ्लैटों को कथित तौर पर ओपन मार्केट में बेचे जाने और सदस्यों के फ्लैटों की रजिस्ट्री से संबंधित स्टांप ड्यूटी की धनराशि के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
जांच में सहयोग नहीं करने का आरोप
शिकायत और विभागीय कार्रवाई में समिति के पदाधिकारियों पर जांच में सहयोग नहीं करने तथा आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराने के आरोप भी सामने आए हैं।
इसके बाद अपर आवास आयुक्त/अपर निबंधक, उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद ने समिति के अभिलेखों के अभिग्रहण का आदेश जारी किया। इसके लिए सहकारी अधिकारी (आवास), गाजियाबाद को अधिग्रहणकर्ता अधिकारी नामित किया गया है। जरूरत पड़ने पर पुलिस बल की सहायता लेने का भी प्रावधान है।
समिति का कार्यालय सील किए जाने की कार्रवाई भी की गई है।
अब रिकॉर्ड कहां हैं?
पीड़ित पक्ष की सबसे बड़ी चिंता समिति के मूल रिकॉर्ड को लेकर है। उनका आरोप है कि कार्यालय सील होने के बावजूद समिति के महत्वपूर्ण दस्तावेजों का एक हिस्सा कार्यालय से बाहर रखा गया है।
शिकायतकर्ताओं ने मांग की है कि समिति की Hard Copies, बही-खाते, बैंक रिकॉर्ड और software-based digital systems को तत्काल सुरक्षित कब्जे में लिया जाए। डिजिटल सिस्टम के User IDs और Passwords को भी सुरक्षित रखने तथा रिकॉर्ड से छेड़छाड़ रोकने के लिए forensic preservation की मांग की गई है।
प्रबंधन में Conflict of Interest का आरोप
शिकायतकर्ताओं ने समिति के प्रबंधन की संरचना पर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि कुछ पदाधिकारी कथित तौर पर समिति के contractor भी हैं।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति एक साथ Managing Committee का सदस्य/सचिव और contractor है, तो काम का ठेका देने से लेकर काम कराने, measurement, quality check और भुगतान तक में हितों का टकराव पैदा हो सकता है।
कुछ अन्य पदाधिकारियों की contractor और property dealer के रूप में कथित भूमिका की भी जांच की मांग की गई है।
समिति की संपत्तियां अपने नाम कराने के आरोप
शिकायत में कुछ संपत्तियों के कथित हस्तांतरण को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
पूर्व सचिव पी. कुमार को लेकर आरोप लगाया गया है कि एक सदस्य की दुकान का आवंटन रद्द कर उसे कथित तौर पर अपने नाम रजिस्टर्ड कराया गया। एक अन्य मामले में करीब ₹2 करोड़ मूल्य के चार बेडरूम वाले फ्लैट को पूर्व सचिव के बेटे के नाम रजिस्टर्ड कराने और दस्तावेजों में लगभग ₹40 लाख से कुछ अधिक भुगतान दिखाए जाने की जांच की मांग की गई है।
इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और दस्तावेजों के सत्यापन के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
पुराने सदस्यों के फ्लैट रद्द कर Open Market में बेचने का आरोप
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कुछ वास्तविक सदस्यों के फ्लैटों का आवंटन रद्द किया गया, जबकि वे समिति को निर्धारित या प्रतिबद्ध कीमत से अधिक राशि का भुगतान कर चुके थे।
आरोप है कि बाद में ऐसे फ्लैटों को Open Market में नए खरीदारों को बेच दिया गया, जबकि मूल सदस्यों की जमा रकम पूरी तरह वापस नहीं की गई।
यही आरोप अब जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
A-1402: 99 प्रतिशत रकम देने के बाद भी आवंटन रद्द होने का दावा
मामले में Flat A-1402 का विवाद भी खासा गंभीर है।
शिकायतकर्ता अरपुथा लता एंजल्स, सदस्यता संख्या 552, के अनुसार वह अप्रैल 2017 में समिति की सदस्य बनीं और वर्ष 2019 में उन्हें A-1402 आवंटित किया गया।
उनका दावा है कि फ्लैट की अनुमानित कीमत ₹69.69 लाख थी और उन्होंने करीब ₹68.13 लाख, यानी लगभग 99 प्रतिशत राशि जमा कर दी थी।
इसके बावजूद अगस्त 2023 में ब्याज और Escalation Charges का हवाला देते हुए उनकी सदस्यता समाप्त कर फ्लैट का आवंटन रद्द कर दिया गया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि यह कार्रवाई वैध AGM निर्णय के बिना की गई।
2025 में किसी और के नाम रजिस्ट्री का दावा
शिकायतकर्ता का कहना है कि बाद में उन्हें पता चला कि 18 जुलाई 2025 को Flat A-1402 किसी अन्य व्यक्ति के नाम रजिस्टर्ड कर दिया गया।
उनका दावा है कि फ्लैट Housing Loan के तहत Mortgage था। ऐसे में Bank की NOC और संबंधित प्रक्रिया के बिना फ्लैट के हस्तांतरण की वैधता की जांच की मांग की गई है।
शिकायतकर्ता ने पूरे मामले में ₹50 लाख से अधिक के वित्तीय नुकसान का दावा किया है।
Escalation Charge को लेकर भी विवाद
शिकायतकर्ताओं ने Construction Linked Plan के बावजूद निर्माण की वास्तविक प्रगति से पहले भुगतान लिए जाने का आरोप लगाया है।
इसके अलावा तय कीमत से करीब 50 प्रतिशत तक अतिरिक्त भुगतान लिए जाने और मूल निर्धारित कीमत का 25 प्रतिशत अतिरिक्त Escalation Charge मांगने का दावा किया गया है।
दिसंबर 2024 की आमसभा को लेकर शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि ₹400 प्रति वर्गफुट Escalation Charge लगाया गया और रकम जमा नहीं करने वाले सदस्यों की रजिस्ट्री/कब्जा रोकने जैसी कार्रवाई की गई।
अब करीब ₹700 प्रति वर्गफुट की नई मांग की तैयारी किए जाने का भी दावा किया गया है। इन बिंदुओं को लेकर विभागीय पत्राचार और शिकायत दस्तावेज में विस्तृत जांच की मांग की गई है।
निर्माण की गुणवत्ता पर भी सवाल
कुछ खरीदारों ने फ्लैटों की निर्माण गुणवत्ता पर भी गंभीर शिकायतें की हैं। इनमें अधूरा निर्माण, खराब finishing, टूटी tiles, seepage तथा plumbing और electrical work में कमियां शामिल हैं।
Agreement में वादा की गई सुविधाएं पूरी तरह उपलब्ध नहीं होने का भी आरोप लगाया गया है।
EOW जांच की मांग
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि मामले का दायरा केवल रजिस्ट्री या कब्जे तक सीमित नहीं है। इसलिए उन्होंने Economic Offences Wing (EOW) से जांच कराने की मांग की है।
उनकी मांग है कि समिति के सभी बैंक खातों, संपत्तियों, फ्लैटों की खरीद-बिक्री, ठेकों, कमीशन और सदस्यों से प्राप्त धन का Forensic Audit कराया जाए।
हाई कोर्ट में Caveat दाखिल करने की बात
पीड़ित पक्ष के अनुसार, कार्रवाई के खिलाफ संबंधित पक्ष अदालत से Stay लेने की कोशिश कर सकता है। इसी आशंका के मद्देनजर गीता नेगी और अशोक अग्रवाल की ओर से हाई कोर्ट में Caveat दाखिल किए जाने की बात कही गई है।
पीड़ित पक्ष का कहना है कि इससे यदि संबंधित पक्ष अदालत में कार्रवाई को चुनौती देता है तो प्रभावित पक्ष को सुने बिना एकतरफा आदेश दिए जाने की आशंका कम होगी।
ITAT का फैसला भी चर्चा में
Sanchar Nest से जुड़ा एक अलग आयकर मामला भी ITAT दिल्ली पहुंचा था। 5 अगस्त 2026 को Tribunal ने Assessment Year 2014-15, 2015-16 और 2016-17 से संबंधित तीन अपीलें मंजूर कीं। 2014-15 के मामले में ₹4.33 करोड़ से अधिक की addition समेत कई additions का उल्लेख था।
हालांकि ITAT ने इन वित्तीय आरोपों के merits पर फैसला नहीं दिया। Tribunal ने Section 153C के तहत कार्रवाई के अधिकार क्षेत्र के आधार पर assessment proceedings को quash किया।
इसलिए ITAT के इस आदेश को समिति के खिलाफ लगे अन्य वित्तीय आरोपों की पुष्टि या खारिज किए जाने के रूप में नहीं देखा जा सकता।
अब सबसे बड़ा सवाल—खरीदारों को उनका घर कब मिलेगा?
Sanchar Nest विवाद अब केवल फ्लैट की रजिस्ट्री और कब्जे का मामला नहीं रह गया है। इसमें फ्लैटों की संख्या, कथित वित्तीय अनियमितताएं, अतिरिक्त शुल्क, संपत्तियों के हस्तांतरण, प्रबंधन में संभावित हितों का टकराव और रिकॉर्ड की सुरक्षा जैसे कई सवाल जुड़ गए हैं।
दस्तावेजों में वर्ष 2026 के दौरान आवास विकास परिषद और अन्य अधिकारियों के स्तर पर हुई कार्रवाई तथा आगे की जांच का भी उल्लेख है।
अब खरीदारों की नजर इस बात पर है कि सभी मूल रिकॉर्ड कब सुरक्षित कब्जे में लिए जाएंगे, वित्तीय लेन-देन की फोरेंसिक जांच कब होगी और वर्षों से पैसा लगाए बैठे सदस्यों को उनकी रजिस्ट्री और कब्जा कब मिलेगा।
पीड़ितों की मांग साफ है—रिकॉर्ड सुरक्षित हों, पैसों का पूरा हिसाब हो, दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई हो और खरीदारों को उनका वैध घर मिले।
